US Election 2020 : क्यों 'मोदी सरकार' है अमेरिका के लिए 'जरूरी मजबूरी', ट्रम्प या बिडेन में से जीते कोई भी भारत रहेगा महत्वपूर्ण

वेबदुनिया न्यूज डेस्क| Last Updated: बुधवार, 4 नवंबर 2020 (16:38 IST)
डोनॉल्ड ट्रम्प या जो बिडेन, दोनों में जो भी अमेरिकी राष्ट्रपति बनता है उसके लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक होगी अमेरिका के सुपरपॉवर के दर्जे को फिर से हासिल करने की।

लेकिन, पिछले कई वर्षों से चीन अमेरिकी सुरक्षा, सायबर सिक्योरिटी, आर्थिक हितों और यहां तक की फेमस अमेरिकन कल्चर और ग्रेट अमेरिकन माइट तक के लिए सबसे बड़े खतरे और चुनौती के तौर पर सामने आया है।
अपनी सैन्य ताकत पर नाज करने वाले 'अंकल सैम' को अब शी जिनपिंग की रेड आर्मी सीधी चुनौती दे रही है।
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सोवियत संघ के पतन के बाद से ही अमेरिका निर्विवाद रूप से सुपर पॉवर रहा है। लेकिन पुतिन के शासन में रूस धीरे-धीरे अपने सैन्य शक्ति और प्रतिष्ठा फिर से हासिल करने में लगा है।

पूरब और पश्चिम में हमेशा से ही ताकत की आजमाइश होती रही है लेकिन यह निर्विवाद सत्य है कि किसी भी देश के लिए ग्लोबल सुपर पॉवर बनने के लिए एशिया में प्रभुत्व होना सबसे जरूरी है।

एशिया में पिछले कुछ वर्षों में शक्ति संतुलन तेजी से बदला है और इस समय चीन, उत्तर कोरिया अमेरिका के खिलाफ सामने आ खड़े हुए हैं। इसके अलावा एशिया में कभी अमेरिका का सबसे बड़ा सहयोगी रहा पाकिस्तान भी अब अमेरिका से छिटक कर चीन के पाले में खड़ा है।

ईरान, तुर्की सहित कई इस्लामिक देश तो काफी पहले से अमेरिका के खिलाफ ही खड़े हुए हैं। नाटो के बल पर यूरोप में सैन्य आधिपत्य भले ही अमेरिका के पास हो लेकिन, साउथ चायना सी से लेकर अफ्रीका और माइक्रोनेशिया में सैन्य संतुलन बिठाने के लिए अमेरिका को फिर अपने मित्र राष्ट्रों, नाटो और दूसरे गठबंधनों को साथ लेना ही होगा।
ट्रम्प और बिडेन के पॉलिटिकल कैम्पेन पर नजर डालें तो यह साफ हो जाता है कि दोनों में से कोई भी जीते डिफेंस और फॉरेन पॉलिसी में अधिक बदलाव नहीं होने वाला, चीन के प्रति अमेरिका आक्रमक और सख्त ही रहेगा।

जहां चीन पर डोनॉल्ड ट्रम्प ने कई बड़े आरोप लगाते हुए सीधे तौर पर कोरोनावायरस फैलाने के लिए जिम्मेदार बताया है। वहीं ट्रेडवॉर में भी ट्रम्प चीन से सीधी भिड़ंत करते आए हैं। हांगकांग से लेकर ताईवान पर चीन को आंखें दिखाने वाले ट्रम्प ने भारत और चीन सीमा विवाद पर हमेशा भारत का ही पक्ष लिया है।

ट्रम्प का मानना है कि चीन साउथ चाइना सी पर कब्जा करके दुनियाभर के 30 फीसदी कारोबार पर कब्जा करना चाहता है। जो सीधे अमेरिका के व्यापारिक हितों को प्रभावित करेगा। सायबर सिक्योरिटी के मसले पर भी ट्रम्प ने चीन के खिलाफ आक्रामक रुख अपना रखा है।
इसी तरह बिडेन भी चीन पर मानवाधिकारों के उल्लंघन से लेकर अमेरिकी चुनाव में दखल देने के आरोप लगाते आए हैं। ट्रम्प की तर्ज पर बिडेन ने भी हांगकांग, तिब्बत और वियतनाम में चीन की मनमानी पर तल्ख रवैया अपनाते हुए साउथ चाइना सी में अमेरिकी बेड़ा स्थायी करने की बात कही है।

एशिया के कई देश जैसे भारत, जापान, वियतनाम, ऑस्ट्रेलिया भी साउथ चायना सी और हिंद महासागर में चीन के बढ़ते दखल से परेशान हैं। वहीं कुछ छोटे देश जैसे नेपाल, श्रीलंका, मालदीव चुप्पी साधे अपने हितों के अनुसार तत्कालीन परिस्थिति को देखकर ही निर्णय लेंगे।


भारत के इस समय पाकिस्तान और चीन से तनावपूर्ण संबंध हैं। लेकिन सॉफ्ट स्टेट का दर्जा त्याग चुके 'नए हिंदुस्तान' को अब अपनी सैन्य शक्ति और आर्थिक ताकत को बढ़ाने के लिए आक्रमक होना जरूरी हो गया है।

डोकलाम से लेकर पूर्वी लद्दाख में चीन को उसी की तर्ज में जवाब देने वाली को अमेरिकी सरकार का पूरा सपोर्ट है। इस्लामिक आतंकवाद के मामले पर भी दोनों ही देश एक मंच पर खड़े हुए हैं।

कोरोनावायरस के कारण भले ही भारत इस समय तय आर्थिक लक्ष्यों से पीछे दिख रहा है, लेकिन भारत का विशाल उपभोक्ता बाजार अमेरिका सहित कई बड़े देशों को बड़ा फायदा करा सकता है। भारतीय बाजार हमेशा सेंटीमेंट बेस्ड मार्केट रहा है। यहां इस समय चीनी वस्तुओं के खिलाफ सेंटीमेंट साफ दिख रहा है।

मंदी से जूझ रहे अमेरिकी इस बात को समझते हैं और इतने बड़े मार्केट पर पकड़ बनाने के लिए भारत के समर्थन में निश्चित रूप से आएंगे। दूसरी ओर, भारत में इस समय एक मजबूत और स्थिर सरकार है जो अमेरिका के साथ है। लॉकडाउन और कोरोनावायरस के चलते भारत में भी आर्थिक परेशानियां हैं और इस समय भारत के संबंध चीन से बेहद तनावपूर्ण हैं तो दोनों की देश एक-दूसरे का साथ देंगे।

पिछले दिनों भारत-अमेरिका में हुए मिसाइल डिफेंस और सर्विलांस पैक्ट से सीधा संदेश है कि एशिया में चीन को टक्कर देने की कूवत सिर्फ भारत में है। इसके अलावा अमेरिका में बहुत से भारतवंशी या भारतीय हैं जो इंडो-अमेरिकन दोस्ती को बनाए रखने में बड़ा फैक्टर साबित होंगे।



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