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कुरबतों में भी जुदाई के...

Written By WD
Updated: शनिवार, 10 मार्च 2012 (13:52 IST)
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कुरबतों में भी जुदाई के जमाने मांगे
दिल वो बेमेहर कि रोने के बहाने मांगे
हम न होते तो किसी और के चर्चे होते
खिलकते शहर तो कहने को फसाने मांगे
यही दिल था कि तरसता था मरासिम के लिए
अब यही तर्के तअल्लुक के बहाने मांगे
- अहमद फराज

उर्दू शायरी के इतिहास में अहमद फराज से ज्यादा एफर्टलेस शायर कोई और नहीं हुआ। उनसे बेहतर किसी को माना जा सकता है, पर वे बहुत आसानी से शेर कहते हैं। उनकी गजल के तमाम शेर एक ही मूड में लिखे गए लगते हैं। ऐसा लगता ही नहीं कि उन्हें कुछ भी प्रयास करना पड़ता है। वे सबसे आसानी से शेर कहते हैं और वे सब स्तरीय भी होते हैं।
- शमशेर

कुरबत-पास होना, निकटता, मिलन। बेमेहर- जो कृपा न करे। खिलकते शहर- शहर के लोग। फसाने- बातें, किस्से। मरासिम- संबंध। तर्के तअल्लुक- संबंध विच्छेद।
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