कुंभ और प्राचीन नगरी उज्जयिनी का महत्व

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इनके अलावा उज्जयिनी के प्रमुख मंदिरों में गोपाल मंदिर, चित्रगुप्त मंदिर, नवग्रह मंदिर, महागणेश मंदिर, भर्तृहरि गुहा, कालभैरव मंदिर, ब्रह्मकुंड और मंगलनाथ मंदिर आदि दर्शनीय हैं। यहां पंचमुखी हनुमानजी की मूर्ति है। कुंभयोग में लोग यहां आकर पंचक्रोशी परिक्रमा करते हैं। महाकालेश्वर मंदिर को केंद्र बनाकर इसके चारों ओर 123 किलोमीटर मार्ग को 5 कोस के व्यास में परिक्रमा करते हैं। इस परिक्रमा में 5 दिन लगते हैं। अनेक साधु-महात्मा भी परिक्रमा में भाग लेते हैं। यात्रा पथ में 84 महादेव, नौ नारायण और सप्त सागर आदि आते हैं। 
 
उज्जयिनी आने के लिए भोपाल होकर आना पड़ता है। भोपाल का सीधा संबंध कलकत्ता, मुंबई, दिल्ली आदि से हाल में जुड़ गया है। यहां आने के लिए रेलवे विभाग से जानकारी प्राप्त की जा सकती है। 

विभिन्न संप्रदाय के साधु-संन्यासी
भारत विचित्र देश है। यहां हर प्रकार की विचित्रताएं मौजूद हैं। जाति, भाषा, समाज, संप्रदाय, धर्ममत सभी विषयों में पर्याप्त विचित्रताएं हैं। हमारे यहां तथा उपासकों में जितनी विभिन्नताएं और विचित्रताएं हैं, उतनी अन्य किसी विषय में नहीं हैं। भारत में कितने प्रकार के धर्म और साधन प्रणालियां हैं, इन सबके बारे में सविस्तार निर्णय करना दु:साध्य है। कुंभ मेला में इन सभी प्रकार की विचित्रताओं का अपूर्व समावेश रहता है। भारत के कोने-कोने से सभी संप्रदाय के लोग, साधु-महात्मा आते हैं। यहां उनमें से कुछ लोगों के बारे में उल्लेख किया जा रहा है।

शैव 
 
1. दसनामी, 2. दण्डी, 3. घरवारी दण्डी, 4. कुटीचक, 5. वहदक, हंस, परमहंस, 6. संन्यासी, 7. नागा, 8. आलेखिया, 9. दंगली, 10. अघोरी, 11. उर्ध्ववाहु, आकाशमुखी, नखी, ठाड़ेश्वरी, उर्ध्वमुखी, पंचधूनी, मौनव्रती, जलशय्यी, जलधारा तपस्वी, 12. कड़ा लिंगी 13. फरारी, दुधाधारी, अलुना, 14. औघड़, गुदड़, सुखड़, रुखड़, भुखड़, 15. शरशय्यी, 16. घरवारी संन्यासी, 17. ठिकरनाथ, 18. सरभंगी, 19. ब्रह्मचारी, 20. योगी, कनफटा योगी, औधड़, अघोरपंथी योगी, 21. योगिनी और संयोगी, 22, लिंगायत, 23. भोपा, 24. दशनामी भांट, 25. मच्‍छेन्द्री, शारंगीहार, डुरीहार, भर्तृहरि, काणिया योगी।
वैष्णव 
 
1. श्री सम्प्रदाय, 2. रामादूत, 3. कबीरपंथी, 4. ममुकदासी, 5. दादुपंथी, 7. रुईदासी, 8 सनपंथी, 9. मधवाचारी, 10. वल्लभाचारी, 11. मीराबाई, 12. निमाइत, 13. विट्ठल भक्त, 14. चैतन्य संप्रदाय, 15. स्पष्ट दायक, 16. वत्ताभजा, 17. राम वल्लभी, 18. साहेब धनी, 19. बाउल, 20. न्याड़ा, 21. दरवेश, 22. साईं, 23. आउल, 24. साध्वनी, 25. सहजी, 26. खुशी-विश्वासी, 27. गौरवादी, 28. बलरामी, हजरती, गौबराई, पागल साथी, तिलक दासी, दर्पनारायणी, अतिबड़ी, 29. राधा वल्लभी, 30. सरवीताबक, 31. चरणदासी, 32. हरिश्चन्दी, 33. माध्‍यमपंथी, माधवी, 34. चूहड़पंथी, 35. कूड़ापंथी, 36. वैरागी, 37. नागा।
शाक्त
 
1. चलिया, 2. करारी, 3. भैरवी और भैरव, 4. शीतला पंडित, 5. पश्वाचारी, 6. वीराचारी, 7. कौलाचारी आदि। 
विविध 
 
संख्या में कम होने पर भी सौर और गाणपत्य संप्रदाय के लोग भारत में विद्यमान हैं। बौद्ध, जैन, सिख आदि भी भारत के विशिष्ट उपासक हैं। इन लोगों के अलावा भी भारत में अन्य अनेक संप्रदाय और उप संप्रदाय के लोग रहते हैं, जैसे-
 
1. निरंजनी साधु, 2. मानभाव, 3. किशोरी भजन, 4. कुलीगायन, 5. टहलिया, 6. दसमार्गी, 7 ज्योग्नि, 8. नरेश पन्थी, 9. पांगु, 10. केउड़ दास, 11. फकीर संप्रदाय, 12. कुंडुपातिया, 13. खोजा आदि।
इन असंख्य साधु और संप्रदायों के अलावा शंकराचार्य प्रवर्तित दसनामी संन्यासी (गिरि, पुरी, भारती, सरस्वती, अरण्य, वन, पर्वत, सागर, तीर्थ, आश्रम) नागा संप्रदाय, नानकपंथी, उदासी, वैरागी और गुरु गोविंद प्रवर्तित निर्मली सिख, शिक्षित तथा प्रतापशाली हैं। इनमें देश, जाति, समाज के प्रति कर्तव्य के दायित्व की भावना जागृत करना क्या उचित नहीं है। इस जमावड़े को संगठित कर राष्ट्रीय निर्माण तथा जातीय उत्थान के लिए युगोचित कार्य में नियोग करना क्या उचित नहीं होगा? लेकिन हो कहां रहा है? 
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