जानिए सम्राट विक्रमादित्य के नवरत्न

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(6) वररुचि

वररुचि ने 'पत्रकौमुदी' नामक काव्य की रचना की। 'पत्रकौमुदी' काव्य के आरंभ में उन्होंने लिखा है कि विक्रमादित्य के आदेश से ही वररुचि ने पत्रकौमुदी काव्य की रचना की। इन्होंने 'विद्यासुंदर' नामक एक अन्य काव्य भी लिखा। इसकी रचना भी उन्होंने विक्रमादित्य के आदेश से की थी।
प्रबंध चिंतामणि में वररुचि को विक्रमादित्य की पुत्री का गुरु कहा गया है। वासवदत्ता के लेखक सुबंधु को वररुचि का भागिनेय कहा गया है, परंतु यह संबंध उपयुक्त प्रतीत नहीं होता। ये वररुचि वैय्याकरण वररुचि से पृथक व्यक्ति थे।

काव्यमीमांसा के अनुसार वररुचि ने पाटलिपुत्र में शास्त्रकार परीक्षा उत्तीर्ण की थी। कथासरित्सागर के अनुसार वररुचि का दूसरा नाम कात्यायन था। इनका जन्म कौशाम्बी के ब्राह्मण कुल में हुआ था। जब ये 5 वर्ष के थे तभी इनके पिता की मृत्यु हो गई थी। ये आरंभ से ही तीक्ष्ण बुद्धि के थे। एक बार सुनी बात ये उसी समय ज्यों-की-त्यों कह देते थे। एक समय व्याडि और इन्द्रदत्त नामक विद्वान इनके यहां आए। व्याडि ने प्रातिशाख्य का पाठ किया। इन्होंने इसे वैसे का वैसा ही दुहरा दिया। व्याडि इनसे बहुत प्रभावित हुए और इन्हें पाटलिपुत्र ले गए। वहां इन्होंने शिक्षा प्राप्त की तथा शास्त्रकार परीक्षा उत्तीर्ण की।






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