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सावन का तीसरा मंगला गौरी व्रत: जानिए धार्मिक महत्व, फायदे और पूजन विधि

mangala gauri vrat vidhi
श्रावण मास (सावन) में जिस प्रकार सोमवार का दिन भगवान शिव की पूजा के लिए समर्पित होता है, उसी प्रकार मंगलवार का दिन माता पार्वती (देवी गौरी) की विशेष आराधना के लिए समर्पित रहता है। सावन मास के मंगलवार को रखे जाने वाले व्रत को मंगला गौरी व्रत कहा जाता है। सावन मास का तीसरा मंगला गौरी व्रत विशेष रूप से अखंड सौभाग्य, दांपत्य जीवन में सुख-शांति और सुयोग्य वर की प्राप्ति के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है।
 

तीसरे मंगला गौरी व्रत का धार्मिक महत्व

माता पार्वती का आशीर्वाद: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। सावन के मंगलवार को माता गौरी की पूजा करने से देवी पार्वती प्रसन्न होकर भक्तों की सभी मनोकामनाएँ पूरी करती हैं।
अखंड सौभाग्य की प्राप्ति: सुहागिन महिलाएँ इस व्रत को अपने पति की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य और सुखी दांपत्य जीवन की कामना के लिए रखती हैं।
मंगल दोष से राहत: ज्योतिषीय दृष्टिकोण से, यदि किसी की कुंडली में मंगल दोष या विवाह में विलंब की समस्या हो, तो सावन में मंगला गौरी व्रत रखने और माता पार्वती के साथ हनुमान जी एवं शिव जी की पूजा करने से मंगल का अशुभ प्रभाव दूर होता है।
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मंगला गौरी व्रत के प्रमुख लाभ

दांपत्य जीवन में मधुरता: यदि पति-पत्नी के रिश्तों में तनाव चल रहा हो, तो यह व्रत रखने से संबंधों में प्रेम और सामंजस्य बढ़ता है।
शीघ्र विवाह का योग: कुंवारी कन्याओं द्वारा यह व्रत रखने से उन्हें मनचाहा और सुयोग्य वर प्राप्त होता है।
संतान सुख की प्राप्ति: जिन दंपतियों को संतान प्राप्ति में बाधाएँ आ रही हों, उनके लिए मंगला गौरी व्रत अत्यंत फलदायी माना गया है।
ग्रह दोषों का निवारण: कुंडली में स्थित मंगल ग्रह और राहु-केतु के अशुभ प्रभावों में कमी आती है।
पारिवारिक समृद्धि: घर से नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है और सुख, समृद्धि एवं शांति का वास होता है।
 

पूजन विधि (संक्षिप्त)

स्नान एवं संकल्प (प्रातः काल स्वच्छ होकर व्रत का संकल्प लें):

सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और लाल या पीले रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद पूजा स्थल की सफाई कर व्रत का संकल्प लें।

माता गौरी एवं शिव जी की स्थापना (चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर प्रतिमा स्थापित करें):

एक लकड़ी की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएँ। उस पर माता पार्वती (मंगला गौरी) और भगवान शिव की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। साथ ही भगवान गणेश जी की स्थापना करें।
 

16 शृंगार एवं पूजन सामग्री अर्पण (सोलह की संख्या में सामग्री अर्पित करने का विधान):

माता गौरी को 16 शृंगार की वस्तुएँ (चुनरी, सिंदूर, चूड़ियाँ, बिंदी आदि), 16 फल, 16 फूल, 16 मालाएँ और 16 सुपारी अर्पित करें। इसके बाद गणेश जी और शिव जी का भी पूजन करें।

व्रत कथा एवं आरती (कथा का श्रवण करें और आरती उतारें):

धूप-दीप जलाकर मंगला गौरी व्रत की कथा सुनें या पढ़ें। इसके बाद कपूर या घी के दीपक से माता पार्वती और भगवान शिव की आरती करें।

भोग एवं पारणा (सात्विक रहकर व्रत पूर्ण करें):

माता जी को हलवे या नैवेद्य का भोग लगाएँ। दिनभर फलाहार रहें और शाम को आरती व पूजन के बाद सात्विक भोजन ग्रहण कर व्रत पूर्ण करें।
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