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'पवित्र जल' से होते हैं ये 5 फायदे

Updated: बुधवार, 17 जून 2020 (18:17 IST)
पांच तत्वों में से एक है जल। शुद्ध जल और पवित्र जल में फर्क होता है। जीवन में दोनों का ही महत्व है। शुद्ध जल से जहां हम कई तरह के रोग से बच जाते हैं वहीं पवित्र जल से हमारा तन और मन निर्मल हो जाता है। जल को हिंदू धर्म में पवित्र करने वाला माना गया है। जल की पवित्रता के बारे में वेद और पुराणों में विस्तार से उल्लेख मिलता है। आखिर यह पवित्र जल क्या होता है और क्या है इसके फायदे, जानिए।
 
 
शुद्ध जल : शुद्ध जल का अर्थ यह कि हमें किसी जल को किसी तकनीक से शुद्ध किया है। जैसे छानकर या प्यूरिफायर से जल को शुद्ध करना। आयुर्वेद के अनुसार सबसे अच्छा पानी बारिश का होता है। उसके बाद ग्लेशियर से निकलने वाली नदियों का, फिर तालाब का पानी, फिर बोरिंग का और पांचवां पानी कुएं या कुंडी का। यदि पानी खराब लगे तो उबालकर पीएं।
 
 
पवित्र जल : जल को पवित्र करने की प्रक्रिया कई तरह की होती है। प्रमुख रूप से जल को पवित्र करने के तीन तरीके हैं- पहला भाव से, दूसरा मंत्रों से और तीसरा तांबे और तुलसी से। भाव से अर्थात भावना से उसे पवित्र करना। जैसे हम जल के प्रति अच्छी भावना रखने हैं और उसे देव समझकर सबसे पहले उसे देवताओं को अर्पित करके के बाद फिर उसे ग्रहण करते हैं तो उसके गुण और धर्म में पवित्रता शामिल हो जाती है। इसी तरह मंत्र से अर्थात किसी विशेष मंत्र से हम जल को पवित्र करते हैं। तीसरा तरीका है कि हम शुद्ध जल को तांबे के किसी पात्र में भरकर रखें और उसमें तुलसी के कुछ पत्ते डाल दें तो यह जल पूर्ण रूप से पवित्र हो जाएगा।
 
 
क्या फायदे हैं इस पवित्र जल के?
1. पवित्र जल छिड़ककर कर लोगों को पवित्र किए जाने की परंपरा आपको सभी धर्मों में मिल जाएगी। हिन्दू धर्म में आरती या पूजा के बाद सभी पर पवित्र जल छिड़का जाता है जो शांति प्रदान करने वाला होता है।
 
2. आचमन करते वक्त भी पवित्र जल का महत्व माना गया है। यह जल तांबे के लोटे वाला होता है। आचमन करते वक्त इसे ग्रहण किया जाता है जिससे मन, मस्तिष्क और हृदय निर्मल होता है। इस जल को बहुत ही कम मात्रा में ग्रहण किया जाता है जो बस हृदय तक ही पहुंचता है।
 
 
3. उचित तरीके और विधि से पवित्र जल को ग्रहण किया जाए तो इससे कुंठित मन को निर्मल बनाने में सहायता मिलती है। मन के निर्मल होने को ही पापों का धुलना माना गया है। जल से ही रोग होते हैं और जल से ही व्यक्ति निरोगी बनता है। जल से ही कई तरह के स्नान के अलावा योग में कुंजल क्रिया, शंखप्रक्षालन और वमन किया होती है। अत: जल का बहुत महत्व होता है।
 
4. यह माना जाता है कि गंगा में स्नान करने से पाप धुल जाते हैं। गंगा नदी के जल को सबसे पवित्र जल माना जाता है। इसके जल को प्रत्येक हिंदू अपने घर में रखता है। गंगा नदी दुनिया की एकमात्र नदी है जिसका जल कभी सड़ता नहीं है। वेद, पुराण, रामायण महाभारत सब धार्मिक ग्रंथों में गंगा की महिमा का वर्णन है।
 
 
5. हिन्दू धर्म में बिंदु सरोवर, नारायण सरोवर, पम्पा सरोवर, पुष्‍कर झील और मानसरोवर के जल को पवित्र माना जाता है। कहते हैं कि इस जल से स्नान करने और इसको ग्रहण करने से सभी तरह के पाप मिट जाते हैं और व्यक्ति का मन निर्मिल हो जाता है।

जल के नियम :
भोजन के पूर्व जल का सेवन करना उत्तम, मध्य में मध्यम और भोजन पश्चात करना निम्नतम माना गया है। भोजन के एक घंटा पश्चात जल सेवन किया जा सकता है। पानी छना हुआ होना चाहिए और हमेशा बैठकर ही पानी पीया जाता है। खड़े रहकर या चलते फिरते पानी पीने से ब्लॉडर और किडनी पर जोर पड़ता है। पानी ग्लास में घुंट-घुंट ही पीना चाहिए। अँजुली में भरकर पीए गए पानी में मीठास उत्पन्न हो जाती है। जहाँ पानी रखा गया है वह स्थान ईशान कोण का हो तथा साफ-सुधरा होना चाहिए। पानी की शुद्धता जरूरी है।
 
पानी पीते वक्त भाव और विचार निर्मल और सकारात्मक होना चाहिए। कारण की पानी में बहुत से रोगों को समाप्त करने की क्षमता होती है और पानी आपकी भावदशा अनुसार अपने गुण बदलते रहते हैं।

लेखक के बारे में
अनिरुद्ध जोशी
पत्रकारिता के क्षेत्र में 26 वर्षों से साहित्य, धर्म, योग, ज्योतिष, करंट अफेयर्स और अन्य विषयों पर लिख रहे हैं। वर्तमान में विश्‍व के पहले हिंदी पोर्टल वेबदुनिया में सह-संपादक के पद पर कार्यरत हैं। दर्शनशास्त्र एवं ज्योतिष: मास्टर डिग्री (Gold Medalist), पत्रकारिता: डिप्लोमा। योग, धर्म और ज्योतिष में विशेषज्ञता।.... और पढ़ें

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