शूर्पणखा कैसे बन गई श्रीकृष्ण की पत्नी, जानिए रहस्य

- पं. सुरेशचन्द्र ठाकुर दंडकारण्य की स्वामिनी शूर्पणखा ने भगवान के महत्वपूर्ण कार्य 'निशिचर हीन करहुं महि भुज उठाय प्रण कीन्ह, विनाशाय च दुष्कृतं' आदि में बहुत सहायता की है। 
जनमानस में शूर्पणखा की छवि राक्षसी होने, कामी होने, निर्ममता से नरसंहार करने की होने से वह घृणा की दृष्टि से देखी जाती है। करोड़ों जन्मों तक तपस्या करने के बाद भी ऋषि-मुनियों को भगवद् दर्शन लाभ नहीं हो पाते, परंतु इसने उनके दर्शन के साथ-साथ बातें भी कीं तथा श्रीराम ने उसकी लक्ष्मणजी से भी बात करवाकर भक्तिस्वरूपा आद्या शक्ति जगत जननी सीता माता के दर्शन भी करवा दिए। एक जिज्ञासा बनी रहती है कि आखिर शूर्पणखा ने ऐसा कौन सा पुण्य किया होगा जिससे उसे यह सौभाग्य प्राप्त हुआ। मनीषी व ज्ञानीजन हमेशा इसका चिंतन किया करते हैं।
 
आइए, शूर्पणखा के पूर्व जन्म का वृत्तांत जानें-
पूर्व जन्म में शूर्पणखा इन्द्रलोक की 'नयनतारा' नामक अप्सरा थी। उर्वशी, रम्भा, मेनका, पूंजिकस्थला आदि प्रमुख अप्सराओं में इसकी गिनती थी। एक बार के दरबार में अप्सराओं का नृत्य चल रहा था। उस समय यह नयनतारा नृत्य करते समय भ्रूसंचालन अर्थात आंखों से इशारा भी कर रही थी। इसे देख इन्द्र विचलित हो गए और उसके ऊपर प्रसन्न हो गए। 
 
तब से नयनतारा इन्द्र की प्रेयसी बन गई। तत्कालीन समय में पृथ्वी पर एक 'वज्रा' नामक एक ऋषि घोर तपस्या कर रहे थे, तब नयनतारा पर प्रसन्न होने के कारण ऋषि की तपस्या भंग करने हेतु इन्द्र ने इसे ही पृथ्वी पर भेजा, परंतु वज्रा ऋषि की तपस्या भंग होने पर उन्होंने इसे राक्षसी होने का श्राप दे दिया। ऋषि से क्षमा-याचना करने पर वज्रा ऋषि ने उससे कहा कि राक्षस जन्म में ही तुझे प्रभु के दर्शन होंगे। तब वही अप्सरा देह त्याग के बाद शूर्पणखा राक्षसी बनी। उसने दृढ़ निश्चय कर लिया कि प्रभु के दर्शन होने पर वह उन्हें प्राप्त कर लेगी।
 
वही नयनतारा वाला मोहक रूप बनाकर ही शूर्पणखा श्रीराम प्रभु के पास गई, परंतु एक गलती कर बैठी। वह यह कि प्रभु परमात्मा परात्पर परब्रह्म को पति रूप में पाने की इच्छा प्रकट कर दी- 
 
'तुम सम पुरुष न मो सम नारी। यह संजोग विधि रचा विचारी।।' 
मम अनुरूप पुरुष जग माही। देखेऊं खोजि लोक तिहुं नाहीं।
ताते अब लगि रहिऊं कुंवारी। मनु माना कप्पु तुम्हहि निहारी।।
 
पं. सुरेशचन्द्र ठाकुर
परब्रह्म को प्राप्त करने की एक प्रक्रिया होती है। भक्ति या वैराग्य के सहारे ही परब्रह्म को प्राप्त किया जा सकता है। शूर्पणखा भक्तिरूपा सीता माता और वैराग्यरूपी श्री लक्ष्मणजी के पास न जाकर सीधे ब्रह्म के पास चली गई। यह उसकी सबसे बड़ी गलती है। वह तो डायरेक्ट श्रीराम की पत्नी बनकर भक्ति को ही अलग कर देना चाहती थी। इसके अलावा वैराग्य का आश्रय लेती तो भी प्रभु को प्राप्त कर सकती थी, परंतु वैराग्य को भी नकारकर अर्थात वैराग्यरूपी श्री लक्ष्मणजी के पास भी न जाकर एवं अहंकार में आकर सीधे प्रभु के पास चली गई। उसमें अहंकार आ गया। वह कहती है- 'संपूर्ण संसार में मेरे समान कोई नारी नहीं'। इसका अर्थ यह हुआ कि समस्त संसार में आपकी पत्नी बनने लायक मेरे समान कोई नारी नहीं है।
 
अहंकारी को प्रभु मिलन संभव ही नहीं हो सकता, फिर भी उचित प्रक्रिया का ज्ञान कराने के लिए उसे वैराग्यरूपी के पास भेजा गया ताकि उसे प्रभु मिलन की सही प्रक्रिया ज्ञात हो सके। शूर्पणखा जैसी गलतियां कई बार हम लोग भी करते हैं, जैसे प्रभु के मंदिर में जाने पर हम लोग जहां अगरबत्ती का खाली पैकेट, नारियल की पॉलिथीन, माचिस की तीली, दूध चढ़ाकर दूध का खाली पाउच मंदिर परिसर में डस्टबिन में न डालकर चाहे जहां फेंक देते हैं। चैनल गेट में ही अगरबत्ती लगा देते हैं, नियत स्थान को छोड़कर पेड़ी पर भी दीपक लगा देते हैं, या भगवान के पैर के पास या शिवजी की जलाधारी के ऊपर ही दीपक रख आते हैं, आदि-आदि...। इस प्रकार के 32 भागवतापराध होते हैं। मंदिरों में जाकर इन 32 अपराधों में से 1 भी अपराध यदि कोई करता है तो उस पर भगवान की कृपा तो नहीं होती है, अपितु वह ईश्वर का कोपभाजन अवश्य बन जाता है।
 
वैरागी लक्ष्मण ने सोचा कि राक्षसी को वैराग्य तो आ नहीं सकता, अत: उसे पुन: प्रभु के पास भेज दिया। तब प्रभु ने कहा कि मैं तो भक्ति के वश में हूं, तब शूर्पणखा भक्तिरूपा सीता माता के पास गई, परंतु वहां भी एक भागवतापराध कर बैठी। सोचा, प्रभु इस भक्ति के वश में हैं, अत: मैं इस भक्ति को ही खा जाऊं। भक्ति को ही नष्ट कर दूं, ज‍बकि नियम यह है कि- 'श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ संतन की सेवा।
 
अत: लक्ष्मणजी ने क्रोध में आकर उसके नाक-कान काटकर अंग भंग कर दिया। तब शूर्पणखा के ज्ञान-चक्षु खुल गए और प्रभु के कार्य को पूरा कराने 'विनाशाय च दुष्कृतम्' के लिए उनकी सहायिका बनकर प्रभु के हाथ से खर व दूषण, रावण, कुंभकर्ण, मेघनाद आदि निशाचरों को मरवा दिया और प्रभु प्राप्ति की उचित प्रक्रिया अपनाने के लिए पुष्करजी में चली गई और जल में खड़ी होकर भगवान का ध्यान करने लगी। आइए, हम भी भगवान रुद्रेश्वर को प्रणाम करें- 
 
'ज्योतिमत्रिस्वरूपाय निर्मल ज्ञान चक्षुसे। 
ॐ रुद्रेश्वराय शान्ताय ब्रह्मणे लिंग मूर्तये।।'
 
की पत्नीं : दस हजार वर्ष बाद भगवान शिव ने शूर्पणखा को दर्शन दिए और वर प्रदान किया कि 28वें द्वापर युग में जब श्रीराम कृष्णावतार लेंगे, तब कुब्जा के रूप में तुम्हें कृष्ण से पति सुख की प्राप्ति होगी। तब श्रीकृष्ण तुम्हारी कूबड़ ठीक करके वही नयनतारा अप्सरा का मनमोहक रूप प्रदान करेंगे।



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