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Written By WD Feature Desk
Last Modified: सोमवार, 5 जनवरी 2026 (15:18 IST)

1000 वर्ष का इतिहास सोमनाथ: पराभव से पुनरुत्थान तक, एक मंदिर जिसने इतिहास को झुकते देखा

Mahmud Ghaznavi
गुजरात के तट पर, जहाँ अरब सागर की लहरें प्रभास क्षेत्र की रेत को छूती हैं, वहाँ खड़ा सोमनाथ मंदिर केवल एक ज्योतिर्लिंग नहीं, बल्कि भारत की अस्मिता का प्रतीक है। महाभारत और पुराणों में वर्णित यह मंदिर अपनी भव्यता और चमत्कारिक वास्तुकला के लिए कभी पूरी दुनिया में विख्यात था।
 
प्रथम शिवलिंग: 12 ज्योतिर्लिंगों में से प्रथम ज्योतिर्लिंग को भगवान चंद्रदेव ने स्थापित किया था। इसीलिए इस सोमनाथ कहा जाता है। चंद्रदेव का एक नाम सोम भी है। विज्ञान और आस्था का अद्भुत संगम
प्राचीन काल में यह मंदिर वास्तुकला का एक अजूबा था। जानकारों के अनुसार, मंदिर का शिवलिंग चुंबकीय शक्ति (Magnetic Force) के सहारे हवा में तैरता था। 
 
चमत्कारिक शिवलिंग: यह तकनीक आज भी शोध का विषय है कि कैसे सदियों पहले भारतीय वास्तुकारों ने गुरुत्वाकर्षण और चुंबकत्व का ऐसा संतुलन बनाया था। इस शिवलिंग को तोड़ दिया गया था। सदियों तक सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के इन टुकड़ों को महान संतों और आध्यात्मिक संरक्षकों द्वारा छिपाकर रखा गया था। 2007 में जब वैज्ञानिकों ने इन टुकड़ों की सामग्री संरचना का अध्ययन किया तो उन्हें कुछ आश्चर्यजनक तथ्य मिला जिसने इस लिंगम् के रहस्य को और गहरा कर दिया। उन्होंने पाया कि इसके केंद्र में एक मजबूत चुंबकीय क्षेत्र है, जो बहुत ही असामान्य है। इसकी रचना कैसे की गई यह आज भी रहस्य बना हुआ है। वर्तमान में श्रीश्री रविशंकरजी के माध्यम से उन्हें जनता के सामने लाया गया है। 
 
लूट और विध्वंस का खूनी इतिहास
सोमनाथ की अपार धन-संपदा और ख्याति ही कई बार उसके संकट का कारण बनी। इसे सात बार तोड़ा और लूटा गया, लेकिन हर बार यह अपनी राख से फिर जी उठा।
 
1. शुरुआती संघर्ष (649- 815 ईस्वी): वैल्लभी के राजाओं द्वारा निर्मित इस मंदिर को पहली बार 725 ईस्वी में सिंध के सूबेदार अल जुनैद ने तोड़ा। प्रतिहार राजा नागभट्ट ने फिर से इसे भव्यता दी।
 
2. महमूद गजनवी का क्रूर हमला (1024-25 ईस्वी): इतिहास का सबसे काला अध्याय तब लिखा गया जब गजनवी ने अपनी सेना के साथ मंदिर पर धावा बोला। उसने न केवल संपत्ति लूटी, बल्कि मंदिर के भीतर पूजा कर रहे हजारों निहत्थे भक्तों का बेरहमी से कत्ल कर दिया।
 
3. खिलजी और सल्तनत काल: 1297 में अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति नुसरत खां और बाद में मुजफ्फरशाह व अहमद शाह ने बार-बार इस आस्था के केंद्र को चोट पहुँचाई।
 
4. औरंगजेब की क्रूरता (1665- 1706 ईस्वी): मुगल बादशाह औरंगजेब ने इसे दो बार तोड़ने का आदेश दिया। जब उसने देखा कि लोग खंडहरों में भी पूजा करने आ रहे हैं, तो उसने वहाँ कत्लेआम करने के लिए सेना भेज दी।
संकल्प और नवनिर्माण: राख से फिर खिला कमल
फिर से निर्माण का इतिहास: जब-जब विध्वंस हुआ, भारतीय राजाओं- मालवा के राजा भोज, गुजरात के राजा भीमदेव और बाद में मराठों ने इसे फिर से खड़ा किया।
 
अहिल्याबाई होल्कर (1783): जब भारत का एक बड़ा हिस्सा मराठों के पास आया, तो इंदौर की रानी अहिल्याबाई ने मूल स्थान के पास ही पूजा के लिए एक नया सोमनाथ मंदिर बनवाया।
 
लौह पुरुष का संकल्प (1950): आजादी के बाद, सरदार वल्लभभाई पटेल ने समुद्र का जल हाथ में लेकर इस मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प लिया।
 
आज का स्वरूप: आधुनिक सोमनाथ मंदिर 'कैलाश महामेरू प्रासाद' शैली में निर्मित है। 1 दिसंबर 1995 को तत्कालीन राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा ने इसे राष्ट्र को समर्पित किया।
 
सोमनाथ हमें सिखाता है कि 'सत्ताएं बदलती हैं, सेनाएं आती-जाती हैं, लेकिन श्रद्धा और सत्य को कभी मिटाया नहीं जा सकता।' आज सोमनाथ मंदिर अपनी पूरी दिव्यता के साथ खड़ा होकर भारत के गौरवशाली अतीत की गवाही दे रहा है।
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