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Yashoda jayanti 2024: आप नहीं जानते होंगे माता यशोदा की यह विलक्षण कथा

Written By WD Feature Desk
Updated: शुक्रवार, 1 मार्च 2024 (09:15 IST)
Krishna Yashoda ki Katha
 
Yashoda Jayanti 2024 Date: हिन्दू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास में कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को माता यशोदा की जयंती मनाई जाती है, उन्होंने भगवान श्री कृष्ण का लालन-पालन किया था। इस बार वर्ष 2024 में मां यशोदा जयंती 01 मार्च, शुक्रवार के दिन मनाई जा रही है। 
 
आइए यहां जानते हैं भगवान श्री कृष्ण की मैया यशोदा की विलक्षण कथा- 
 
पौराणिक ग्रंथों के अनुसार देवी यशोदा को नंद की पत्नी के रूप में बताया गया है। भागवत पुराण में यह कहा गया है देवकी के पुत्र भगवान श्री कृष्ण का जन्म देवकी के गर्भ से मथुरा के राजा कंस के कारागार में हुआ। कंस से रक्षा करने के लिए जब वासुदेव जन्म के बाद आधी रात में ही उन्हें यशोदा के घर गोकुल में छोड़ आए तो उनका पालन-पोषण यशोदा ने किया।

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भारत के प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में बालक कृष्ण की लीलाओं के अनेक वर्णन मिलते हैं। जिनमें यशोदा को ब्रह्मांड के दर्शन, माखनचोरी और उसके आरोप में ओखल से बांध देने की घटनाओं का सूरदास ने सजीव वर्णन किया है। 
 
यशोदा ने बलराम के पालन-पोषण की भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जो रोहिणी के पुत्र और सुभद्रा के भाई थे। उनकी एक पुत्री का भी वर्णन मिलता है जिसका नाम एकांगा था। वसुश्रेष्ठ द्रोण और उनकी पत्नी धरा ने ब्रह्माजी से यह प्रार्थना की- 'देव! जब हम पृथ्वी पर जन्म लें तो भगवान श्री कृष्ण में हमारी अविचल भक्ति हो।' ब्रह्मा जी ने 'तथास्तु' कहकर उन्हें वर दिया। इसी वर के प्रभाव से ब्रजमंडल में सुमुख नामक गोप की पत्नी पाटला के गर्भ से धरा का जन्म यशोदा के रूप में हुआ। और उनका विवाह नंद से हुआ। नंद पूर्व जन्म के द्रोण नामक वसु थे। भगवान श्री कृष्ण इन्हीं नंद-यशोदा के पुत्र बने। 
 
श्री यशोदा जी चुपचाप शांत होकर सोई थीं। रोहिणी जी की आंखें भी बंद थीं। जब वसुदेव ने यशोदा की पुत्री को उठाकर कान्हा को यशोदा के पास सुलाया तो अचानक सूतिका गृह अभिनव प्रकाश से भर गया। सर्वप्रथम रोहिणी माता की आंख खुली। वे जान गई कि यशोदा ने जन्म दिया है।
 
रोहिणी जी दासियों से बोल उठीं- 'अरी! तुम सब क्या देखती ही रहोगी? कोई दौड़कर नंद को सूचना दे दो।' फिर क्या था, दूसरे ही क्षण सूतिकागार आनंद और खुशियों के कोलाहल में डूब गया। एक नंद को सूचना देने के लिए दौड़ी। एक दाई को बुलाने के लिए गई। एक शहनाई वाले के यहां गई। चारों ओर आनंद का साम्राज्य छा गया। विधिवत जातकर्म संस्कार संपन्न हुआ। 
 
नंद ने इतना दान दिया कि याचकों को और कहीं मांगने की आवश्यकता ही समाप्त हो गई। संपूर्ण ब्रज ही मानो प्रेमानंद में डूब गया। माता यशोदा बड़ी ललक से हाथ बढ़ाती हैं और अपने हृदयधन को उठा लेती हैं तथा शिशु के अधरों को खोलकर अपना स्तन उसके मुख में देती हैं। भगवान शिशुरूप में मां के इस वात्सल्य का बड़े ही प्रेम से पान करने लगते हैं। 
 
कंस के द्वारा भेजी हुई पूतना अपने स्तनों में कालकूट विष लगाकर गोपी-वेश में यशोदा नंदन श्री कृष्ण को मारने के लिए आई। उसने अपना स्तन श्री कृष्ण के मुख में दे दिया। श्री कृष्ण दूध के साथ उसके प्राणों को भी पी गए। शरीर छोड़ते समय श्री कृष्ण को लेकर पूतना मथुरा की ओर दौड़ी। उस समय यशोदा के प्राण भी श्री कृष्ण के साथ चले गए। उनके जीवन में चेतना का संचार तब हुआ, जब गोप-सुंदरियों ने श्री कृष्ण को लाकर उनकी गोद में डाल दिया।
 
यशोदानंदन श्री कृष्ण क्रमश: बढ़ने लगे। मैया का आनंद भी उसी क्रम में बढ़ रहा था। जननी का प्यार पाकर श्री कृष्णचंद्र इक्यासी दिनों के हो गए। मैया आज अपने सलोने श्री कृष्ण को नीचे पालने में सुला आई थीं। कंस-प्रेरित उत्कच नामक दैत्य आया और शकट में प्रविष्ट हो गया। वह शकट को गिराकर श्री कृष्ण को पीस डालना चाहता था। इसके पूर्व ही श्री कृष्ण ने शकट को उलट दिया और शकटासुर का अंत हो गया।
 
भगवान श्री कृष्ण ने माखन लीला, ऊखल बंधन, कालिया उद्धार, गोचारण, धेनुक वध, दावाग्नि पान, गोवर्धन धारण, रासलीला आदि अनेक लीलाओं से यशोदा मैया को अपार सुख प्रदान किया। इस प्रकार ग्यारह वर्ष छ: महीने तक माता यशोदा का महल श्री कृष्ण की किलकारियों से गूंजता रहा। 
 
आखिर श्री कृष्ण को मथुरा पुरी ले जाने के लिए अक्रूर आ ही गए। अक्रूर ने आकर यशोदा के हृदय पर मानो अत्यंत क्रूर वज्र का प्रहार किया। पूरी रात श्री नंद जी श्री यशोदा को समझाते रहे, पर किसी भी कीमत पर वे अपने प्राणप्रिय पुत्र को कंस की रंगशाला में भेजने के लिए तैयार नहीं हो रही थीं। आखिर योगमाया ने अपनी माया का प्रभाव फैलाया। यशोदा जी ने फिर भी अनुमति नहीं दी, केवल विरोध छोड़कर वे अपने आंसुओं से पृथ्वी को भिगोने लगीं। 
 
श्री कृष्ण चले गए और यशोदा विक्षिप्त-सी हो गईं, उनका हृदय तो तब शीतल हुआ, जब वे कुरुक्षेत्र में श्री कृष्ण से मिलीं। राम-श्याम को पुन: अपनी गोद में बिठाकर माता यशोदा ने नवजीवन पाया। अपनी लीला समेटने से पहले ही भगवान ने यशोदा माता को विष्णु लोक भेज दिया।
 
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