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Ayodhya Ram Temple Ceremony : द्वापर में श्रीकृष्‍ण ने बनवाया था अयोध्या का ये अद्भुत राम मंदिर

Updated: बुधवार, 5 अगस्त 2020 (09:21 IST)
5 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर भूमि पूजा करने के बाद राम मंदिर का निर्माण प्रारंभ हो जाएगा इसी के साथ रामनगरी के लगभग 150 से अधिक जर्जर हो चुके पौराणिक मंदिरों का भी पुनरुद्घार होगा। उन्हीं में से एक है द्वापर युग में भगवान कृष्ण के द्वारा बनवाया गया कनक भवन मंदिर। अयोध्या आने वाले श्रद्धालु हनुमानगढ़ी, श्रीराम जन्मभूमि के साथ कनक भवन अवश्य जाते हैं।
 
 
कनक भवन मंदिर की कथा ( Kanak Bhawan Temple ) : श्रीराम का सीता से विवाह होने के बाद राम के मन में यह विचार उठा की जब जनकनंदिनी हमारी अयोध्या जाएंगी तो वहां अति सुंदर भवन होना चाहिए। कहते हैं कि जिस क्षण यह विचार उठा उसी क्षण महारानी कैकेयी को स्वपन्न में एक दिव्य कनक भवन दिखाई पड़ा। तब दशरथजी ने शिल्पी विश्वकर्माजी से उसी तरह का महल बनवाया जो रानी ने स्वप्न में देखा था। फिर माता कैकेयी ने वह भवन अपनी बहू सीता को मुंह-दिखाई में दे दिया। विवाह के बाद राम-सीता इसी भवन में रहने लगे। कहते हैं कि इस महल में असंख्य दुर्लभ रत्न जड़े हुए थे।

 
राजा कुश ने बनवा दिया था मंदिर : जब माता सीता धरती में समा गई और प्रभु श्रीराम ने जल समाधी ले ली तब उनका पुत्र कुश अयोध्या का राजा बना और उसने इस भवन में राम और सीता की मूर्ति रखवाकर इसे मंदिर में बदल दिया था।

 
श्रीकृष्ण ने पुन: बनवाया था भवन : द्वापर में श्रीकृष्ण अपनी पटरानी रुक्मिणी सहित जब अयोध्या आए, तब तक कनक भवन टूट-फूट कर एक ऊंचा टीला बन चुका था। भगवान श्रीकृष्ण ने उस टीले पर परम आनंद का अनुभव किया।

 
उन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से यह जान लिया कि इसी स्थान पर कनक भवन निर्मित था। तब श्रीकृष्ण ने अपने योग-बल द्वारा उस टीले से श्रीसीता-राम के प्राचीन विग्रहों को प्राप्त कर वहां स्थापित कर दिया। 

 
ऐसा भी कहते हैं कि कहते हैं कि जरासंध का भीम द्वारा वध करने के बाद श्रीकृष्ण तीर्थाटन के लिए निकले थे इस दौरान वे प्रभु राम की नगरी अयोध्या में उनकी पूजा करने भी गए थे। उस दौरान उन्होंने यहां एक टीले पर मां पद्मासना को तपस्या करते देख वहां विशाल कनक भवन मंदिर का निर्माण कराया था। 

 
विक्रमादित्य के शिलालेख है इसका सबूत : श्रीकृष्ण के अयोध्या आगमन की जानकारी हमें विक्रमादित्य कालीन एक शिलालेख से मिलती है। इसमें बताया गया है कि जरासंध वध के बाद भगवान श्रीकृष्ण जब तीर्थाटन करते हुए अयोध्या पहुंचे तो कनक भवन के टीले के पास एक पद्मासना देवी को तपस्या करते देखा तो श्रीकृष्ण ने यहां पर कनक भवन का फिर से निर्माण करवाया और मूर्तियों को स्थापित करवाया। 

 
आज से लगभग दो हजार वर्ष पूर्व सम्राट विक्रमादित्य ने इसका जीर्णोद्धार करवाकर सीताराम के युगल विग्रहों को वहां पुन: प्रतिष्ठित किया था। महाराज विक्रमादित्य द्वारा बनवाया गया विशाल कनक भवन एक हजार वर्ष तक ज्यों का त्यों बना रहा।

 
ओरछा के राजा की पत्नी के कराया जिर्णोद्धार : कालांतर में कई बार इस मंदिर का निर्माण और जीर्णोद्धार होता रहा। इस मंदिर का जो वर्तमान स्वरूप है वह सन् 1891 का है, जिसका निर्माण ओरछा के राजा सवाई महेन्द्र प्रताप सिंह की प्रताप की पत्नी महारानी वृषभानु कुमारी की देखरेख में हुआ था। इससे पहले भी कई बार इस मंदिर का निर्माण और जीर्णोद्धार हो चुका है।

 
मंदिर का परिचय : महल जैसा दिखाई देने वाला यह मंदिर बहुत ही भव्य है। सीता-राम का अन्त:पुर है कनक भवन। माना जाता है कि यहां स्थित दोनों के दोनों विग्रह अनुपम और विलक्षण हैं। इनका दर्शन करते ही लोग मंत्रमुग्ध होकर अपनी सुध-बुध भूल जाते हैं। मुख्य गर्भगृह में श्री राम और माता सीता की प्रतिमा स्थापित है।
लेखक के बारे में
अनिरुद्ध जोशी
पत्रकारिता के क्षेत्र में 26 वर्षों से साहित्य, धर्म, योग, ज्योतिष, करंट अफेयर्स और अन्य विषयों पर लिख रहे हैं। वर्तमान में विश्‍व के पहले हिंदी पोर्टल वेबदुनिया में सह-संपादक के पद पर कार्यरत हैं। दर्शनशास्त्र एवं ज्योतिष: मास्टर डिग्री (Gold Medalist), पत्रकारिता: डिप्लोमा। योग, धर्म और ज्योतिष में विशेषज्ञता।.... और पढ़ें
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