7 बड़े धर्मान्तरण और भारत बन गया बहुधर्मी देश

संतों का संप्रदाय : इसके अलावा भारत में ऐसे बहुत से संत हुए हैं जिन्होंने अपना एक अलग संप्रदाय चलाया और अपने तरीके से एक नए धर्म को गढ़ने का प्रयास किया, लेकिन वह महज एक संप्रदाय में ही सिमटकर रह गए। ऐसे सैकड़ों संप्रदाय हैं जिनके कारण हिन्दू आपस में बंटा हुआ है साथ ही हिन्दुओं में एक भ्रम ‍और भटकाव की स्थिति निर्मित कर दी गई है।
प्रारंभ में गुप्त और मध्यकाल में संत संप्रदायों का बहुत विकास हुआ। इस काल में वल्लभ, रामानंद, माधव, बैरागी, दास, निम्बार्क, गौड़ीय, श्री संप्रदाय, उदासीन, निर्मली, दसनामी, नाथ, दादू, लालदासी, चरणदासी, रामस्नेही, निरंजनी, रामनंदी, सखी, वारकरी, नामदेव, चैतन्य महाप्रभु, स्वामी प्रभुपाद, आदि संप्रदायों की रचना हुई।> > उसी तरह सूफी संप्रदाय में भी चिश्ती सम्प्रदाय, कादरी सम्प्रदाय, सुहरावर्दी सम्प्रदाय, नक्शबंदिया सम्प्रदाय का जन्म हुआ। बड़ी संख्या में कई गैर-मुस्लिमों ने भी इस मत में खुद को दीक्षित किया। इसके अलावा गुजरात में 1539 आसपास एक नए समाज की रचना हुई जिसे बोहरा मुस्लिम समाज कहा जाने लगा। इसके दो विभाजन हैं दाऊदी बोहरा और सुलेमानी बोहरा। इनमें भारतीयों की संख्या ही अधिक है, जिसमें गुजरात के ब्राह्मण, व्यापारी और किसान शामिल हैं। भारत में दाऊदी बोहरा संप्रदाय के लोग अधिक हैं।
इसके अलावा 1844 को अस्तित्व में आया बहाई धर्म भी भारत में सक्रिय रहा है। बहाई पंथ की शुरुआत ईरान में हुई थी। यह भी एकेश्वरवादी धर्म है। इसकी स्थापना बहाउल्लाह ने की थी और इसके मतों के मुताबिक दुनिया के सभी मानव धर्मों का एक ही मूल है। बहाउल्लाह (1817-1892) बहाई धर्म के ईश्वरीय अवतार हैं। इसके अलावा अहमदिया संप्रदाय के भी लाखों लोग भारत और पाकिस्तान में पाए जाते हैं।  मुस्लिम सुन्नी समाज के लोग इनको मुसलमान नहीं मानते हैं। सुन्नी तो शियाओं को भी मुसलमान नहीं मानते। हालांकि इसके कुछ कारण है जिसमें से एक है अल्लाह को छोड़कर अन्य की इबादत करना।

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