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मेरठ में आफत की बारिश, अंतिम संस्कार में भी बनी बाधा
मेरठ में आधे घंटे की झमाझम बारिश ने नगर निगम के दावों की पोल खोल दी। नगर निगम के अफसर दावे कर रहे थे कि उन्होंने मानसून आने से पहले सभी नालों की सफाई करा दी है और सड़कों पर राहगीरों के बचाव के लिए टीनशेड आदि की पूरी तैयारी कर ली गई है, लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल अलग है, क्योंकि गुरुवार को हुई कुछ देर की बारिश के बाद मेरठ के पुराना शहर और मुख्य मार्गों पर जलभराव हो गया। जहां सड़कें पानी में डूबकर तालाब बन गईं, वहीं शमशान घाट के टूटे टीनशेड में शव का अंतिम संस्कार करने में परिजनों के पसीने छूट गए।
कई कॉलोनियां पानी से लबालब हो गईं और सड़क पर रेहड़ी लगाने वालों और यात्रियों को बेहद परेशानी उठानी पड़ी। मेरठ शहर की लगभग आधी आबादी जलभराव की समस्या से परेशान है। नगर निगम प्रतिवर्ष सर्वाधिक जलभराव वाले क्षेत्र चिह्नित करता है, लेकिन इन इलाकों से बारिश में जमा होने वाले पानी से राहत नहीं मिलती।
प्री मानसून की गुरुवार को हुई बारिश ने नगर निगम के हर दावे को धो दिया। भले ही नालों से सिल्ट निकालकर कागजों में सफाई अभियान दिखा दिया जाता हो, लेकिन मुख्य नालों से जुड़े छोटे नालों की सफाई नहीं होती। घरों और बाजारों में नालियों को पाट दिया गया है, जिसके चलते नाले-नालियां चोक हो जाते हैं, पानी की निकासी न होने पर सड़कें जलमग्न हो गईं।
कई बार जलभराव के कारण सड़कों पर लोगों को गड्ढे दिखाई नहीं देते, जिसके चलते वाहन पलट जाते हैं या रूक जाते हैं। फिलहाल मानसून ने अपने आने की आहट दे दी है, लेकिन अभी तक मेरठ नगर निगम ने कंट्रोल रूम भी स्थापित नहीं किया है।
मेरठ शहर की जल निकासी के लिए तीन बड़े नाले ओडियन नाला, कसेरूखेड़ा नाला और आबूनाला है। इन नालों से शहर के 341 छोटे-बड़े नाले और जुड़ते हैं। छोटे-बड़े नालों के जरिए इन मुख्य नालों में गली-मोहल्लों का पानी पहुंचता है।
गलियों में लोगों ने पशु पाल रखे हैं, जिनका गोबर और घरों का कूड़ा नल निकासी में बाधा पैदा कर देता है। बड़ी समस्या ये भी है कि नालों की सिल्ट निकालकर वहीं छोड़ दी जाती है और ये समय से न उठ पाने के कारण वह पुनः नालों में समा जाती है।
मेरठ में जलभराव की समस्या से तो लाखों लोग परेशान हैं ही, अब शमशान घाट भी बारिश से अछूते नहीं हैं। मेरठ के अब्दुलापुर में बारिश के दौरान चिता जलाना मुश्किल हो जाता है, क्योंकि टीनशेड से पानी सीधा चिता पर गिरता है।
गुरुवार को हुई बारिश में अंतिम संस्कार करने में तीन घंटे से अधिक का समय लगा। दो बार चिता को अग्नि देनी पड़ी, वहीं पानी से लकड़ियों को बचाने के लिए प्लास्टिक के बोरे डालने पड़े। बात करें प्लास्टिक की तो सरकार ने इन्हें जलाने पर रोक लगा रखी है, इनका धुआं कोरोना काल में और भी घातक हो जाता है।
पिछले दिनों गाजियाबाद जिले के मुरादनगर का शमशान घाट बारिश के चलते कई लोगों की कब्रगाह बन गया था, क्योंकि एक व्यक्ति को अंतिम विदाई देने आए शोकाकुल लोगों पर आफत की बारिश आ गई। बारिश से बचने के लिए करीब डेढ़ सौ लोग टीनशेड के नीचे खड़े थे। अचानक टीनशेड और एक दीवार घटिया मटेरियल के कारण भरभरा के लोगों के ऊपर गिर गई। एक व्यक्ति को विदा करने आए लोग में से कई लोग खुद भी इस दुनिया से विदा हो गए।
ऐसे हादसों के बाद भी नगर निगम और सरकारी मशीनरी सबक नहीं लेती है। हादसे के बाद जांच होती और कुछ लोग सस्पेंड कर दिए जाते हैं और कुछ समय बाद फिर से पहले जैसा नजारा नजर आता है।
