प्राचीन तवांग मठ में आधुनिकता की लहर

इटानगर (भाषा)| भाषा|
में तवांग स्थित प्राचीन के युवा भिक्षु आधुनिकता के असर से बच नहीं पाए हैं। उन्हें कम्प्यूटर और मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते तथा मोटरसाइकिल र सवारी करते देखा जा सकता है। उनका तर्क है कि आधुनिकता और आध्यात्मिकता में कोई टकराव नहीं है।

वरिष्ठ भिक्षुओं ने भी यही तर्क दिया। उनका कहना है कि इच्छाओं पर वश हो जाने पर आधुनिकता का कोई असर नहीं हो सकता।

उन्होंने कहा हम बौद्ध दर्शन का ज्ञान अर्जन करने तथा हिन्दी और अंग्रेजी जैसी भाषा जानने के लिकम्प्यूटर का इस्तेमाल कर रहे हैं।

मठ में फिलहाल 10 कम्प्यूटर हैं और कुछ और लाए जाने हैं। मठ में कक्षा आठ तक की शिक्षा सुलभ है। उच्च शिक्षा के लिए वहाँ से छात्रों को बिहार में सारनाथ भेजा जाता है।
ल्हासा के बाद बुद्ध की सबसे बड़ी मूर्ति इसी मठ में है, जिसकी ऊँचाई नौ मीटर है। उसके सामने बैठे युवा भिक्षु समगेलता ने बताया कि जब वे नौ साल के थे, तभी वे भिक्षु बन गए थे। समगेलता विनम्रता से यह स्वीकारते हुए कहते हैं कि जीवन में दुःखों से मुक्ति भगवान बुद्ध के बताए मार्ग पर चले बिना संभव नहीं है और वे इसके लिए भरसक साधना करेंगे।
उन्होंने कहा 17 साल बाद भी मुझे लगता है कि मैं अध्यात्म के बारे में बहुत कम जान पाया हूँ। जब भी मेरा दिमाग भटकता हैं, मैं ध्यान करता हूँ और भगवान बुद्ध की शिक्षाओं का पालन करता हूँ।

वैज्ञानिक मनुष्य की समस्या का समाधान बाहर ढूँढते हैं, लेकिन समस्या तो भीतर आत्मा से जुड़ी है। मन की शांति अध्यात्म के बिना संभव नहीं है।
उनके विचार में अंतरयात्रा के लिए भिक्षु को शुरुआत में एकान्त में रहना जरूरी है। जैसे-जैसे वह अपने मन पर नियंत्रण करता है वह बाहरी जगत के आडम्बरों से बचता चला जाता है।

की स्थापना पाँचवें दलाई लामा की इजाजत के बाद 1681 में की गई। शुरुआत में जिस श्रद्धालु के तीन अथवा उससे अधिक बेटे होते थे, उसे एक को भिक्षु के रूप में मठ में भेजना पड़ता था। कालांतर में नियमों में शिथिलता आई और यह जरूरी नहीं रह गया।
भारत-चीन सीमा पर स्थित मठ में इस समय 465 भिक्षु रहते हैं। भिक्षुणियाँ मठ से कुछ किलोमीटर दूरी पर स्थित ब्रह्म एने गोनपा, तेंगाचुंग एने गोनपा तथा ज्ञानद्रोंग एने गोनपा में रहती हैं। अधिकारियों ने बताया कि जिले में अपराध और भ्रष्टाचार की दर बहुत कम है। आध्यात्मिक माहौल के कारण ऐसा संभव है।

प्रौढ़ भिक्षु जहाँ आध्यात्मिक चर्चा में व्यस्त रहते हैं, वहीं छोटे भिक्षुओं को खेलकूद करते देखा जा सकता है। मठ में रहने वालों को हर दिन केवल सीमित समय के लिए टेलीविजन देखने की अनुमति है और वह भी केवल समाचार कार्यक्रम के लिए।

 

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