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ऐसी जगह जहां आदिवासी साढ़े 3 माह मनाते हैं राखी पर्व

Updated: गुरुवार, 3 अगस्त 2017 (17:37 IST)
वीरेन्द्र 
 
 सैलाना क्षेत्र का आदिवासी समुदाय एक दिन के लिए रक्षाबंधन का त्योहार नहीं मनाता है, बल्कि साढ़े तीन माह तक उनका रक्षाबंधन चलता है। अजब-गजब, निराले किंतु निःस्वार्थ भाव से प्रेमपूर्वक इस समुदाय का यह त्योहार श्रावण की अमावस्या से शुरू होकर कार्तिक सुदी चौदस पर जाकर खत्म होता है।
 
अपने-अपने हिसाब से बहन-बेटियों को इन दिनों में अपने मायके लाया जाता है। ऐसा नहीं है कि श्रावण मास की पूर्णिमा को यह लोग राखी नहीं मनाते हैं। दरअसल, ज्यादातर बहन-बेटियां तो इसी दिन परंपरानुसार अपने भाई को राखी बांधने मायके पहुंच जाती हैं, पर यदि किन्हीं कारणों से यह संभव न हो पाए, तो राखी मनाने की साढ़े तीन माह तक पूरी छूट इन्हें है। 
 
बहन-बेटियां भी मायके मिठाई व राखी लेकर आती हैं। वैरायटी व कीमत पर न जाएं हम। प्रेमपूर्वक राखी बांधने व बदले में उपहार के रूप में कपड़े या नकदी पाने की रीत यहां भी है। खाने में हलवा, पूरी, पकौड़ी या जो कुछ भी संबंधित की क्षमता हो, सब यहां भी बनाया जाता है। ग्राम पहाड़ी बंगला के हिन्दू खराड़ी व ओंकार खराड़ी बताते हैं पूरे रस्मो-रिवाज से आदिवासी समुदाय भी मौत में शोक की राखी रखने जाते हैं यानी मायके में कोई गमी होने पर शोक की राखी लेकर भी बहन-बेटियां जाती हैं।

ग्राम भेरूघाटा के लक्ष्मण भगत व नारायणगढ़ के अकमरू अमलियार बताते हैं कि आदिवासी समुदाय में सुबह से शाम तक राखी मनती है। सुबह बहन-बेटियां भाइयों, भतीजों को राखी बांधती हैं और शाम को परिवार के सभी लोग घर के दरवाजों पर, खाट, हल व खल पर अन्य कृषि औजारों पर, पशुओं पर राखी बांधते हैं। 
 
एक और अनूठी परंपरा
 
एक और अनूठी परंपरा आदिवासी समुदाय में है। शादी के बाद जब बेटी की पहली राखी आती है तो बेटी के मायके के 40 से 50 लोग बेटी के ससुराल इसे लिवाने जाते हैं। तब बेटी के ससुराल वाले अपनी क्षमता के मान से भोज का आयोजन कर सभी को ससम्मान विदा देते हैं। इसे आदिवासी भाषा में 'पाली' लेकर जाना कहते हैं। 
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