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8 और 9 मार्च को शीतला माता का पर्व, जानिए पौराणिक कथा और इतिहास

Updated: शनिवार, 3 मार्च 2018 (16:47 IST)
शीतला माता का पर्व कभी माघ मास में शुक्ल पक्ष की षष्ठी को, कही वैशाख मास में कृष्ण पक्ष की अष्टमी को तो कही चैत्र मास में कृष्ण पक्ष की सप्तमी अथवा अष्टमी को मनाया जाता है। शीतला माता अपने साधकों के तन-मन को शीतल कर देती है तथा समस्त प्रकार के तापों का नाश करती है। शीतला माता का पर्व चाहे षष्टी को हो, सप्तमी को हो या अष्टमी को इसे दूसरे नामों से भी जाना जाता है, जैसे बसौड़ा अथवा बसियौरा भी इसे कहा जाता है। वर्ष 2018 का शीतला माता पर्व गुरुवार और शुक्रवार यानी 8 और 9 मार्च 2018 को मनाया जाएगा। 
 
पौराणिक कथा
एक बार की बात है, प्रताप नगर में गांववासी शीतला माता की पूजा-अर्चना कर रहे थे और पूजा के दौरान गांव वालों ने गरिष्ठ का प्रसाद माता शीतला को प्रसाद रूप में चढ़ाया। गरिष्ठ प्रसाद से माता शीतला का मुंह जल गया। इससे माता शीतला नाराज हो गई। माता शीतला क्रोधित हो गई और अपने कोप से सम्पूर्ण गांव में आग लगा दी जिससे सम्पूर्ण गांव जलकर रख हो गया परन्तु एक बुढ़िया का घर बचा हुआ था।
 
गांव वालों ने जाकर उस बुढ़िया से घर ने जलने का कारण पूछा तब बुढ़िया ने माता शीतला को प्रसाद खिलाने की बात कही और कहा कि मैंने रात को ही प्रसाद बनाकर माता को ठंडा एवम बासी प्रसाद माता को खिलाया। जिससे माता शीतला ने प्रसन्न होकर मेरे घर को जलने से बचा लिया। बुढ़िया की बात सुनकर गांव वालों ने माता शीतला से क्षमा याचना की तथा अगले पक्ष में सप्तमी/अष्टमी के दिन उन्हें बासी प्रसाद खिलाकर माता शीतला का बसौड़ा पूजन किया।

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माता शीतला पर्व का महत्व 
 
हिन्दू धर्म के अनुसार माता शीतला अष्टमी को महिलाएं अपने परिवार तथा बच्चो की सलामती के लिए एवम घर में सुख,शांति के लिए रंग पंचमी से अष्टमी तक माता शीतला को बासौड़ा बनाकर पूजती है। माता शीतला को बासौड़ा में कढ़ी-चावल, चने की दाल, हलवा, बिना नमक की पूड़ी आदि चढ़ावे के एक दिन पूर्व रात्रि में बना लिए जाता है तथा अगले दिन यह बासी प्रसाद माता शीतला को चढ़ाया जाता है। पूजा करने के पश्चात महिलाएं बासौड़ा का प्रसाद अपने परिवारो में बांट कर सभी के साथ मिलजुल कर बासी भोजन ग्रहण करके माता शीतला का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। 

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