सम्बंधित जानकारी
- शरद पूर्णिमा विशेष : चंद्र देव से संबंधित वह जानकारी जो आपको कहीं नहीं मिलेगी
- कौन हैं चंद्रदेव, कैसे हुआ उनका जन्म, पढ़ें दिलचस्प पौराणिक कथा...
- शरद पूर्णिमा की रात में सिर्फ इस एक मंत्र को पढ़ लीजिए.. मिलेगा इतना कुछ जो आपने सोचा भी नहीं होगा
- शरद पूर्णिमा को मंत्र नहीं पढ़ सकते तो यह लोककथा भी देगी मनचाहा वरदान, पढ़ें और घर में सबको सुनाएं
- सेहत, सुख, शांति और धन, सब कुछ देंगे शरद पूर्णिमा के यह 5 सरल चंद्र मंत्र
लंकापति रावण शरद पूर्णिमा की रात यौवन के लिए करता था कुछ ऐसा कि आप दंग रह जाएंगे
शरद पूर्णिमा की चमकीली रात का धार्मिक महत्व तो जान लिया अब जानिए वैज्ञानिक महत्व
अध्ययन के अनुसार शरद पूर्णिमा के दिन औषधियों की स्पंदन क्षमता अधिक होती है। रसाकर्षण के कारण जब अंदर का पदार्थ सांद्र होने लगता है, तब रिक्तिकाओं से विशेष प्रकार की ध्वनि उत्पन्न होती है।
लंकाधिपति रावण शरद पूर्णिमा की रात चंद्र किरणों को दर्पण के माध्यम से अपनी नाभि पर ग्रहण करता था। इस प्रक्रिया से उसे पुनर्योवन शक्ति प्राप्त होती थी।
चांदनी रात में 10 से मध्यरात्रि 12 बजे के बीच कम वस्त्रों में घूमने वाले व्यक्ति को ऊर्जा प्राप्त होती है। सोमचक्र, नक्षत्रीय चक्र और आश्विन के त्रिकोण के कारण शरद ऋतु से ऊर्जा का संग्रह होता है और बसंत में निग्रह होता है।
अध्ययन के अनुसार दुग्ध में लैक्टिक अम्ल और अमृत तत्व होता है। यह तत्व किरणों से अधिक मात्रा में शक्ति का शोषण करता है। चावल में स्टार्च होने के कारण यह प्रक्रिया और आसान हो जाती है। इसी कारण ऋषि-मुनियों ने शरद पूर्णिमा की रात्रि में खीर खुले आसमान में रखने का विधान किया है। यह परंपरा विज्ञान पर आधारित है।
शोध के अनुसार खीर को चांदी के पात्र में सेवन करना चाहिए। चांदी में प्रतिरोधकता अधिक होती है। इससे विषाणु दूर रहते हैं। हल्दी का उपयोग निषिद्ध है। प्रत्येक व्यक्ति को कम से कम 30 मिनट तक शरद पूर्णिमा का स्नान करना चाहिए। रात्रि 10 से 12 बजे तक का समय उपयुक्त रहता है।
वर्ष में एक बार शरद पूर्णिमा की रात दमा रोगियों के लिए वरदान बनकर आती है। इस रात्रि में दिव्य औषधि को खीर में मिलाकर उसे चांदनी रात में रखकर प्रात: 4 बजे सेवन किया जाता है। रोगी को रात्रि जागरण करना पड़ता है और औषधि सेवन के पश्चात 2-3 किमी पैदल चलना लाभदायक रहता है।
