नई दिशा देगा मोदी का दौरा

पुनः संशोधित बुधवार, 24 सितम्बर 2014 (16:51 IST)
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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का अमेरिकी दौरा ऐसे समय में हो रहा है जबकि भारत के राजनीतिक परिदृश्य में जहां एक ओर सत्ता परिवर्तन हो चुका है, वहीं दूसरी ओर भारत में आम चुनावों से पहले अमेरिकी प्रतिष्ठान ने दोनों देशों के संबंधों को संभालने में कई गलतियां की हैं। राष्ट्रपति ओबामा के जो सलाहकार पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह की कार्यशैली के आदी थे, उन्होंने यह मान लिया था कि भारत में लगभग हालत वही रहेगी और उन्होंने भारत में बदलाव की हवा को अनदेखा कर दिया था।
 
ओबामा और उनके सलाहकारों को अब भारत के ऐसे नए चेहरे से सामना करना होगा जिसका प्रतिनिधित्व प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी करते हैं। उनके साथ यह स्पष्ट है कि वे एक स्वस्थ द्विपक्ष‍ीय भावना से चीजों को देखते हैं। उनके बारे में कहा जा सकता है कि मोदी देश के राष्ट्रीय सुरक्षा हितों को लेकर स्पष्ट हैं और वे वृद्धि और विकास को लेकर पूरी तरह से कटिबद्ध हैं। इस कारण से मोदी का अमेरिका दौरा भारत अमेरिकी संबंधों की दशा और दिशा को परिभाषित करने की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण होगा। 
 
इसका पृष्ठभूमि मोदी की सफल नेपाल और जापान यात्रा से तय हो चुकी है। उन्होंने यह भी दिखा दिया है ‍कि मित्रों के साथ मिलनसारिता का अर्थ यह नहीं है कि जब मोदी को सख्त होने की जरूरत हो तो वे वहां पर सख्त नहीं हो सकते हैं। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भारत यात्रा के दौरान वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीनी सैनिको की घुसपैठ की घटनाओं को उन्होंने पूरी सख्‍ती से उठाया और यह प्रशंसनीय है। इसके परिणामस्वरूप भारत को अपने पड़ोसियों के साथ संबंधों में एक नई वास्तविकता को स्थान मिला है और इसका महत्व अमेरिकी मेजबानों के सामने भी समाप्त नहीं होगा। 
 
वास्तव में कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ओबामा के बीच सीधी बातचीत में चीन की घुसपैठ का मामला भी शामिल हो सकता है। लेकिन कोई भी यह नहीं चाहेगा कि इसके चलते भारत और अमेरिका के बीच दीर्घकालिक से अनसुलझे मुद्दों पर बातचीत ही नहीं हो। इस दौरे पर दोनों ही देशों के बीच मित्रता का आधार अपने पूर्ववत स्थान पर रहेगा और यह माना जा सकता है कि दुनिया में लोकतंत्र समर्थक दो सबसे बड़े देशों के बीच 'स्वाभाविक' मैत्री होना चाहिए। शीत युद्ध की समाप्ति के बाद विश्व शांति को प्रभावित करने वाले ज्यादातर मुद्दों पर दोनों पक्षों का रुख एक जैसा ही होगा। 
 
लेकिन, ऐसा देखा जा रहा है कि कथित तौर पर सामरिक संबंधों में अगले दौर (नेक्स्ट स्टेज इन स्ट्रेटजिक पार्टनरशिप) तक पहुंचने के बाद भी दोनों देशों के संबंध आर्थिक, राजनीतिक और सुरक्षा संबंधी मामलों में एक अनिश्चय के दौर में प्रवेश कर गए हैं। ऐसे प्रत्येक हिस्से को समझ की नई व्यवस्था के साथ नए सिरे से परिभाषित करना होगा। इस मामले में अमेरिकी पक्ष की ओर से और अधिक स्पष्टता दिखाने की जरूरत होगी। और यह तभी संभव होगा कि जब भारतीय चिंताओं को भलीभांति तरीकों से समझा जाए और इनका निपटारा किया जाए। 
 
भारत सरकार देश में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के जरिए अपने दरवाजे खोल रही है और यह इसके अंतर्गत सार्वजनकि-निजी साझेदारी को बढ़ाने और देश को उत्पादन क्षेत्र का एक हब बनाने की नीति घोषित कर चुकी है। सरकार ने वादा किया है कि यह परियोजनाओं की स्वीकृति मिलने में बाधक नौकरशाही को रास्ते से हटा देगी। जबकि अमेरिकी संदर्भ में यह कहना जरूरी होगा कि उनकी कंपनियों को पूरी तरह से एकतरफा लाभदेयता की उम्मीद नहीं करना चाहिए और उन्हें अपने लालच पर लगाम लगानी होगी।  
 
अगर अमेरिकी पक्ष ऐसा करता है तो ही दोनों सरकारों के बीच आर्थिक सहयोग का मार्ग प्रशस्त होगा। फिलहाल यह अमेरिका की वैश्विक दृष्टि और इसमें भारत की भूमिका के भी अनुरूप होगा और इसके लिए दोनों देशों के संबंधों में एक सामरिक सुधार की भी जरूरत हो सकती है। दोनों ही देशों ने खुद को शीतयुद्ध काल की पुरानी अपेक्षाओं और उम्मीदों से मुक्त कर लिया है। भारत-अमेरिकी असैन्य परमाणु समझौता भारत की इसी  इच्छा का प्रतीक है कि यह वैश्वीकृत जगत की आर्थिक बहु-मतभिन्नता का हिस्सा बनना चाहता है और इसके साथ ही यह दुनिया की सैनिक सत्ता की दौड़ का हिस्सा नहीं बनना चाहता है। 
 
इसलिए अमेरिका, भारत को उन सभी मामलों में साझेदार समझ सकता है जोकि वैश्विक शांति से जुड़े हों, परमाणु अप्रसार से जुड़े हों, बाल्टिक क्षेत्र से जुड़े हों या फिर दक्षिण चीन महासागर की समस्या से जुडे हों। लेकिन इस बात के साथ ही भारत की आवाज का सम्मान भी करना होगा। हालांकि आर्थिक वैश्वीकरण और अंतरराष्ट्रीय राज्य व्यवस्था से भारत-अमेरिकी संबंधों को कोई चुनौती नहीं है, लेकिन यह राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्‍दों पर कोई समझौता नहीं कर सकती है। मोदी की सरकार पिछली यूपीए सरकार की भांति महत्व के मुद्दों को सॉफ्ट पेडल नहीं कर सकती है। साथ ही जिन मुद्दों पर दोनों देशों के बीच स्पष्ट मतभेद हैं, उन पर स्पष्ट जवाब भी मांग सकती है। 
 
दोनों ही देशों के बीच पाकिस्तान को लेकर परस्पर विरोधी विचार हैं। विदित हो कि अमेरिका के एक दशक लम्बे समय तक चले 'आतंक के खिलाफ संघर्ष' में भारत ने  इसका पूरा साथ दिया। पूरी तरह से अमेरिकी गठबंधन का समर्थन किया लेकिन इसके बदले में भारत को पाकिस्तान प्रायोजित सीमा पार के आतंकवाद के खिलाफ वांछित अमेरिकी समर्थन और सहयोग नहीं मिला। भारत पर आतंकवादी हमले में पाकिस्तान के अडि़यल रवैए और उसकी करतूतों को अमेरिकी समर्थन से भारत को गहरा धक्का लगा है। 
 
कट्‍टरपंथी इस्लाम की ताकतों के खिलाफ अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिमी देशों के मोर्चे को पाक-अफगान क्षेत्र में भारत-अमेरिकी दृष्टिकोण से ज्यादा मदद नहीं मिलने वाली है। इसलिए जहां तक हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा की बात है तो इस इलाके का उपयोग पाकिस्तान द्वारा भारत विरोधी गतिविधियों के लिए किया जाना, हमारी महत्वपूर्ण चिंता बनी रहेगी। और इस मामले में ओबामा प्रशासन को समझना होगा कि अगर वह भारत-अमेरिकी संबंधों को समानता पर रखना चाहता है तो उसे पाकिस्तान को लेकर भारतीय हितों की संवेदनशीलता को समझना होगा। 



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