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सुब्रमण्यम स्वामी का पीएम मोदी पर विवादित बयान, क्या है इसका रामसेतु कनेक्शन?
नई दिल्ली। वरिष्ठ भाजपा नेता और राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर विवादित बयान दिया है। बयान पर बवाल मच गया।
उन्होंने कहा कि अगर 12 जनवरी, 2023 को सुप्रीम कोर्ट से पहले, सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल राम सेतु (Ramsetu) को राष्ट्रीय विरासत स्मारक के रूप में स्वीकार करने की घोषणा नहीं करते हैं तो मोदी को नमक हरामी के रूप में जाना जाएगा।
उल्लेखनीय है कि राम सेतु को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने की मांग को लेकर नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी।If on Jan 12, 2023 before the CJI court, the Solicitor General on behalf of the government does not declare acceptance of Ram Setu as a national heritage monument, Modi will be known as namak haraami.
— Subramanian Swamy (@Swamy39) January 1, 2023
संसद में मोदी के मंत्री का बड़ा बयान : हाल ही में केंद्रीय मंत्री जीतेंद्र सिंह ने राज्य सभा में एक सवाल के जवाब में कहा था कि भारत और श्रीलंका के बीच जहां राम सेतु के होने की बात की जाती है, वहां के सैटेलाइट चित्रों के आधार पर सटीक रूप से यह कह पाना मुश्किल है कि वहां किस तरह का ढांचा था।
हरियाणा से सांसद कार्तिकेय शर्मा का सवाल था कि क्या सरकार भारत के प्राचीन इतिहास के वैज्ञानिक आकलन की कोई कोशिश कर रही है या नहीं। जवाब में सिंह ने यह बताया कि केंद्र सरकार का अंतरिक्ष विभाग इन कोशिशों में लगा हुआ है, लेकिन जहां तक राम सेतु का सवाल है उसकी खोज करने में हमारी कुछ सीमाएं हैं क्योंकि उसका इतिहास 18,000 साल से भी ज्यादा पुराना है।
मंत्री ने राज्य सभा को बताया कि इन चित्रों में उस इलाके में कुछ द्वीप और चूने के पत्थर के ढेर तो नजर आते हैं लेकिन इन्हें सटीक रूप से किसी पुल के अवशेष नहीं कहा जा सकता।
क्या है Ram Setu: वाल्मीकि रामायण और रामचरित मानस के अनुसार प्रभु श्री राम ने श्रीलंका जाने के लिए समुद्र के ऊपर एक ब्रिज बनाया था। उस सेतु अर्थात पुल के आज भी अवशेष पाए जाते हैं, परंतु 'सेतुसमुद्रम परियोजना' के तहत इस सेतु को बहुत हद तक क्षति पहुंचाई जा चुकी है।
भारत के दक्षिण में धनुषकोटि तथा श्रीलंका के उत्तर पश्चिम में पम्बन के मध्य समुद्र में 48 किमी चौड़ी पट्टी के रूप में उभरे एक भू-भाग के उपग्रह से खींचे गए चित्रों को अमेरिकी अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (नासा) ने जब 1993 में दुनियाभर में जारी किया तो भारत में इसे लेकर राजनीतिक वाद-विवाद का जन्म हो गया था। इस पुल जैसे भू-भाग को राम का पुल या रामसेतु कहा जाने लगा।
राम सेतु का चित्र नासा ने 14 दिसम्बर 1966 को जेमिनी-11 से अंतरिक्ष से प्राप्त किया था। इसके 22 साल बाद आई.एस.एस 1 ए ने तमिलनाडु तट पर स्थित रामेश्वरम और जाफना द्वीपों के बीच समुद्र के भीतर भूमि-भाग का पता लगाया और उसका चित्र लिया। इससे अमेरिकी उपग्रह के चित्र की पुष्टि हुई।
वाल्मीकि रामायण के अनुसार, जब श्रीराम ने सीता को लंकापति रावण से छुड़ाने के लिए लंका द्वीप पर चढ़ाई की, तो उस वक्त उन्होंने विश्वकर्मा के पुत्र नल और नील से एक सेतु बनवाया था जिसे बनाने में वानर सेना से सहायता की थी। इस सेतु में पानी में तैरने वाले पत्थरों का उपयोग किया गया था जो कि किसी अन्य जगह से लाए गए थे। कहते हैं कि ज्वालामुखी से उत्पन्न पत्थर पानी में नहीं डूबते हैं। संभवत: इन्हीं पत्थरों का उपयोग किया गया होगा।
