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मानसून की गड़बड़ी- बढ़ रही बाढ़

Updated: मंगलवार, 10 अक्टूबर 2017 (14:50 IST)
मानसून वापसी पर है…इस बीच यह कई बार धड़ाके से बरसा तो कई बार आँखों को तरसाता रहा। चौंकाने वाली बात यह है कि मध्य भारत में कुल वर्षा कम हो रही है, तब भी चरम बारिश की घटनाओं में वृद्धि हो रही है। इसका मतलब है कि भारी बारिश तो है पर उसकी अवधि अल्प है और उसी के बनिस्बत लंबे समय का सूखा पड़ रहा है।
 
मुंबई में 29 अगस्त 2017 को बारिश का कहर बरपा और लोगों ने जन-जीवन को अस्त-व्यस्त होते हुए नज़दीक से देखा, लेकिन ऐसा पहली बार तो नहीं हुआ, उससे पहले भी 26 जुलाई 2005 को ऐसा हाहाकार मचा था। उत्तराखंड और उत्तर भारत में बादल फटने या भारी बारिश से होने वाली तबाही की घटनाएँ आम हैं।
 
भारतीय अनुसंधान संस्थान (आईआईटीएम), पुणे के डॉ. रॉक्सी मैथ्यू कोल और उनकी टीम के नेतृत्व के अध्ययन की एक रिपोर्ट जो हाल ही में नेचर कम्युनिकेशंस में प्रकाशित हुई है, उस पर नज़र दौड़ाएँ तो साफ़ दिख सकता है कि सन् 1950 से बारिश का कहर तिगुना बरपा है। इससे महाराष्ट्र ही नहीं गुजरात, ओड़िशा और असम को ही देख लें मध्य और उत्तर-भारत में जान-माल की हानि हुई है।
 
 
पिछले एक दशक में बाढ़ से वैश्विक आर्थिक नुकसान प्रति वर्ष 30 अरब डॉलर से अधिक हो रहा है, जिनमें एशिया में चरम बारिश वाली घटनाओं से जुड़े कुछ सबसे बड़े घाटे भी हैं। अकेले भारत में चरम बारिश की घटनाओं के लिए जिम्मेदार ठहराए जाने वाले नुकसान में प्रति वर्ष लगभग 3 अरब डॉलर का नुकसान हुआ है, जो वैश्विक आर्थिक नुकसान का 10% है। 
 
यह अध्ययन दर्शाता है कि "भारी बारिश" की घटना के कारण बाढ़ की इन घटनाओं में वृद्धि हुई है। सन् 1950-2015 के दौरान इन व्यापक चरम घटनाओं में तीन गुना बढ़ोतरी मिलती है। अंतरराष्ट्रीय आपदा (इंटरनेशनल डिसास्टर) डेटा बेस के अनुसार सन् 1950-2015 से भारत में बाढ़ की 268 घटनाओं ने 825 मिलियन लोगों को प्रभावित किया, 17 लाख बेघर हुए लोगों को छोड़ दें तब भी 69 हजार लोगों की मौतें बाढ़ के कारण उपजीं स्थितियों से हुई।
 
अत्यधिक बारिश की घटनाओं में वृद्धि का एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ कुल मानसून वर्षा कम हो रही है। तथ्य यह है कि इस तरह की गड़बड़ी मानसून की बारिश की पृष्ठभूमि के खिलाफ है, जो इसे विनाशकारी बनाता है, क्योंकि यह कई लाखों लोगों के जीवन, संपत्ति और कृषि को खतरे में डालता है। एक और तथ्य यह है कि बीते एक दशक से नैऋत्य मानसून की तीव्रता में 10-20 प्रतिशत तक की कमी आई है तब भी बीते आधे दशक से भारतीय उपखंड खासकर मध्य भारत में अतिवृष्टि, भारी बाढ़ की घटनाएँ बढ़ी हैं।
 
तंत्र : यह एक पहेली बनी हुई है कि कुल मानसून वर्षा और स्थानीय नमी की उपलब्धता घट जाने के बावज़ूद आवश्यक नमी कहाँ से आ रही है? आम तौर पर यह माना जाता था कि इन भारी वर्षाओं में से कई की वजह कम दबाव वाली वे प्रणालियाँ हैं, जो बंगाल की खाड़ी में विकसित होती हैं, और उत्तर पश्चिमी दिशा में केंद्र भारतीय उपमहाद्वीप में नमी लाती हैं। हालाँकि, देखे गए रिकॉर्ड से संकेत मिलता है कि इन निम्न-दबाव प्रणालियों की आवृत्ति में वास्तव में गिरावट आई है। इसलिए हैरानी कि बात है कि कमजोर मानसून के बावजूद चरम बारिश बढ़ रही है और मध्य भारत में कम दबाव प्रणाली की संख्या में कमी आई है।
 
रॉक्सी मैथ्यु कौल, सुबिमल घोष, अमेय पाठक, मिलिंद मुजुमदार, आर अथुल्य, रघु मुर्तुगुद्दी, पास्कर टेरे और एम राजीववन का सामूहिक शोध आलेख के रूप में प्रतिष्ठित वैश्विक पत्रिका नेचर कम्युनिकेशंस में प्रकाशित हुआ। मुज़ुमदार कहते हैं कि इस अतिरिक्त नमी को अरब सागर लेकर आता है। पश्चिम से आने वाली ये हवा नमी लिए होती है और बंगाल की खाड़ी तटस्थ भूमिका निभाती है।
 
अब तक यह माना जाता था कि बंगाल की खाड़ी में कम दबाव के पट्टे तैयार होने की वजह से मध्य भारत में मूसलधार बारिश होती है। जबकि वर्तमान अध्ययन में पता चलता है कि उत्तरी अरब सागर के ऊपर मानसून की हवाएँ बढ़ती परिवर्तनशीलता का प्रदर्शन कर रही हैं, नमी की आपूर्ति को बना रही हैं, जिससे पूरे केंद्रीय भारतीय बेल्ट में चरम बारिश की घटना हो सकती हैं। यह कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन सहित मानव गतिविधियों में वृद्धि के परिणामस्वरूप, अरब सागर में नमी की वृद्धि की वजह से है।
 
उत्तरी अरब सागर के गर्म समुद्र का तापमान नमी बढ़ाता है और मानसून की पश्चिमी हवाओं के बड़े उतार-चढ़ाव होते हैं। भारी वर्षा के लिए ज़रूरी नमी में से 36 प्रतिशत नमी अरब सागर से और 29 प्रतिशत नमी स्थानीय स्रोतों से आती है और केवल 26 प्रतिशत बंगाल की खाड़ी से आती है। नैऋत्य भारत के कुछ भाग और पाकिस्तान के भूखंड पर बढ़ते तापमान की वजह भी भारी वर्षा का कारण है।
 
बड़े पैमाने पर : इन घटनाओं में से अधिकांश मध्य भारत के एक बड़े क्षेत्र में फैली हुई हैं, जिसके परिणामस्वरूप बड़े पैमाने पर बाढ़ (70 डिग्री -90 डिग्री पू., 18° -26 डिग्री उ., क्षेत्र में 500,000 किमी 2, और 500 मिलियन की जनसंख्या को, जो संपूर्ण अमेरिकी आबादी से भी अधिक है) को देखा जा सकता है।
 
पूर्वानुमान : इन चरम बारिश वाली घटनाओं का दो-तीन हफ्ते पहले अनुमान लगाया जा सकता है, जो जीवन और संपत्ति पर उनके विनाशकारी प्रभाव को कम करने में मदद करेगा। उदाहरण के लिए, आईएमडी और आईआईटीएम के पूर्वानुमान से संकेत मिलता है कि हाल ही में मुंबई बाढ़ (29 अगस्त 2017) के पहले 5-6 दिन पहले भारी बारिश हुई थी, और एक चेतावनी दी गई थी। यह दीगर है कि इस पूर्वानुमान  को तब तक गंभीरता से नहीं लिया गया जब तक घटना हो नहीं गई!
 
हाल की बाढ़ : सन् 2016 के गर्मियों के मानसून के दौरान, अत्यधिक बारिश की घटनाएँ मध्य भारत क्षेत्र में हुईं, जिससे बड़े पैमाने पर बाढ़ आई। बाढ़ व्यापक थी, और मुंबई सहित पश्चिमी तट में जीवन और संपत्ति को नुकसान पहुँचा गई और पूर्वोत्तर भारत में असम राज्य में काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान जलमग्न हो गया। इन बाढ़ों के दौरान उपग्रह बारिश के आंकड़ों के एक स्नैपशॉट से पता चलता है कि भारी बारिश की घटना तीन दिनों की अवधि में फैली हुई है। व्यापक बारिश की घटनाओं की क्षेत्रीय सीमा को देखने से पता चलता है कि इनमें एक बड़ी समानता भारी बारिश की घटनाओं के बढ़ते रुझानों की है। हाल ही में मुंबई में सन् 2017 बाढ़ ने भी इसी समान पैटर्न का प्रदर्शन किया।
 
ऐतिहासिक बाढ़ : कुछ ऐतिहासिक बाढ़ का विश्लेषण करें तो पाएँगे कि तीन दिनों की अवधि का विस्तार लिए हुई इस का तीव्र वर्षा का नमी स्रोत अरब सागर था, जिसका नतीजा यह दिखा, उदाहरण के लिए, सन् 1989 और सन् 2000 में केंद्रीय भारतीय बाढ़, सन् 2005 में मुंबई की बाढ़, सन् 2007 में दक्षिण एशियाई बाढ़, आदि। 
 
जब किसान की तकती आँखें बारिश का लंबा मौसम चाहती है ताकि उसके खेतों को फुहारें मिल सकें, वहीं यह बारिश भारी बाढ़ लेकर आती है जो मिट्टी को बहा ले जाती है। यदि इसी तरह चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब बारिश तो होगी..पर वह केवल विपदा लेकर आएगी और हम तब भी बूँद-बूँद को तरसेंगे। 
लेखक के बारे में
स्वरांगी साने
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