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नोटबंदी : जेब में पैसे हैं, खर्च नहीं कर रहे हैं लोग...

#नोटबंदी

Updated: शुक्रवार, 18 नवंबर 2016 (13:57 IST)
नोटबंदी से लोगों का हाल-बेहाल हैं। लोग अब बेहद आवश्यक वस्तुएं ही खरीद रहे हैं। बाजार ठप है, पैसे की कमी से व्यापारी न तो माल बेच पा रहा है, न खरीद पा रहा है। गरीब, मजदूर, किसानों की स्थिति तो ओर भी खराब है। एक तरफ पैसों की तंगी है तो दूसरी ओर आवक-जावक नहीं होने से परेशानी और बढ़ गई है। अब तो काम के लाले भी पड़ने लगे है। इसका एक पहलू यह भी है कि बैंकों और एटीएम से पैसे तो निकल रहे हैं पर लोगों की जेब से नहीं। 
 
अर्थव्यवस्था तो छोटे नोटों से ही चलती है और सरकार द्वारा बड़े नोट बंद करने के बाद लोगों ने आवश्यक कार्यों हेतु इन नोटों को भी अपने पास जमा कर लिया। जिन लोगों के लिए पैसा बेहद जरूरी था वे तो बैंकों, पोस्ट ऑफिस और एटीएम के बाहर लाइन में खड़े ही थे। उन लोगों ने बेहद जरूरी होने पर ही खर्च किया और शेष अपने पास रख लिया।   
 
पहले जो लोग पहले 'दबाकर' खर्च करते थे, अब 'दबाकर' खर्च कर रहे हैं। पहले जब पैसे थे तो खुलकर खर्च करते थे अब पैसे होने पर भी खर्च करने में भारी संकोच हो रहा है। कठिन समय की आहट से लोगों की जेब से पैसा निकल ही नहीं रहा है। इसका एक सकारात्मक पक्ष यह भी है कि चूंकि लोग अनावश्यक खर्च नहीं कर रहे हैं इसलिए उनकी बचत भी हो रही है। 
 
जब सरकार ने बड़े नोट बंद किए तो लोगों के घरों में दबे दस और पांच के सिक्के भी बाहर आए। दस के सिक्के बंद होने की अफवाह से बाजार में हड़कंप मच गया। लोग अब बेहद जरूरी सामान ही खरीद रहे हैं। किराना तो जरूरी है लेकिन कॉस्मेटिक्स खरीदने से बच रहे हैं।
 
मोबाइल पर लोग अब इंटरनेट चलाने की बजाए केवल फोन पर बात ही कर रहे हैं। यहां तक भी फोन भी बेहद जरूरी होने पर ही लगा रहे हैं। पेट्रोल पंपों पर पुराने नोट चलने की खबर से लोग मजबूरी में पेट्रोल-डीजल तो जमकर भरा रहे हैं लेकिन मीठे, नमकीन से परहेज करने लगे हैं। चाय वाले, पान वाले से लेकर रोड़ पर सामान बेचने वालों का हाल बेहाल है। ज्यादातर दुकाने सूनी पड़ी है।
 
पिछले दस दिनों से लोगों ने उन सब वस्तुओं से किनारा सा कर लिया है जो लोगों को बेहद जरूरी लगती थी और विलासिता पूर्ण थी। लोग अब प्राइवेट कार की बचाए बसों में सफर कर रहे हैं। होटलों पर धर्मशालाओं को तरजीह दे रहे हैं। इस तरह हर व्यक्ति पैसे निकालने और बचाने में लगा है। खर्च करने की आदत पर बचाने की प्रवृति हावी होने से लोगों के काम धंधों के पटरी पर आने में ज्यादा समय लग सकता है। इससे स्थिति अराजक होने और बेरोजगारी बढ़ने का खतरा भी बढ़ जाएगा। 
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