'वंदे मातरम्' की नई गाइडलाइन, सरकार पर भड़के AIMIM नेता, बोले- गर्दन पर छुरी रखकर नहीं कहलवा सकते, मदनी ने बताया मनमानी
केंद्रीय गृह मंत्रालय के द्वारा 'वंदे मातरम्' को लेकर जारी की गई नई गाइडलाइन पर एआईएमआईएम दिल्ली के अध्यक्ष शोएब जमई ने विरोध जताया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) ने निर्देश दिया है कि राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रगान के एक साथ बजने पर 'वंदे मातरम' के सभी छह छंद पहले गाए जाएंगे। जमई ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि मुसलमानों की गर्दन पर छुरी रखकर वंदे मातरम नहीं कहलवा सकते। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर संविधान में कहीं यह कहां लिखा है कि वंदे मातरम् संवैधानिक अनिवार्यता है।
उनके मुताबिक न तो यह संविधान का हिस्सा है और न ही इसे राष्ट्रगान का दर्जा प्राप्त है। उन्होंने स्पष्ट किया कि राष्ट्रगान का सम्मान सभी करते हैं और उस पर कोई विवाद नहीं है।वंदे मातरम् को लेकर उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर पहले भी कई मुस्लिम विद्वान और उलेमा अपनी राय रख चुके हैं। उनका कहना है कि इन विद्वानों ने इसे इस्लाम के एकेश्वरवाद की मान्यता और धार्मिक सिद्धांतों के विपरीत बताया है, इसलिए इसे थोपना उचित नहीं है।
जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने बताया मनमाना
जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने गुरुवार को इसे 'एकतरफा' और 'मनमाना' करार दिया। संगठन ने दावा किया कि यह संविधान द्वारा गारंटीकृत धार्मिक स्वतंत्रता पर 'सीधा हमला' है। मीडिया खबरों के मुताबिक जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि मुस्लिम किसी को भी वंदे मातरम गाने या बजाने से नहीं रोकते हैं, लेकिन गीत की कुछ पंक्तियां ऐसी मान्यताओं पर आधारित हैं जो वतन को एक देवता के रूप में चित्रित करती हैं, जो एकेश्वरवादी धर्मों (एक ईश्वर को मानने वाले धर्मों) की मौलिक मान्यताओं के विरुद्ध है।
उन्होंने कहा कि सभी सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों, कॉलेजों और समारोहों में वंदे मातरम के सभी छंदों को अनिवार्य रूप से गाने का केंद्र का 'एकतरफा और जबरन निर्णय' न केवल भारत के संविधान द्वारा दी गई धार्मिक स्वतंत्रता पर 'कठोर प्रहार' है, बल्कि अल्पसंख्यकों के संवैधानिक अधिकारों को कम करने का एक व्यवस्थित प्रयास भी है।
उन्होंने लिखा कि चूंकि एक मुसलमान केवल एक अल्लाह की इबादत करता है, इसलिए उसे यह गीत गाने के लिए मजबूर करना संविधान के अनुच्छेद 25 और सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का स्पष्ट उल्लंघन है। मदनी ने अपने बयान में यह भी कहा कि इस गीत को अनिवार्य बनाना और नागरिकों पर थोपने की कोशिश करना देशभक्ति की अभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि यह चुनावी राजनीति, सांप्रदायिक एजेंडे और बुनियादी मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाने के सुनियोजित प्रयास को दर्शाता है।
मदनी ने कहा कि देश के प्रति प्रेम की सच्ची कसौटी नारों में नहीं बल्कि चरित्र और बलिदान में निहित है, जिसके चमकदार उदाहरण मुसलमानों और जमीयत उलेमा-ए-हिंद के ऐतिहासिक संघर्ष में प्रमुखता से देखे जा सकते हैं। इस तरह के फैसले देश की शांति, एकता और लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करते हैं और संविधान की भावना को ठेस पहुंचाते हैं। Edited by : Sudhir Sharma