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मानसिक स्वास्थ्य की परवाह क्यों नहीं?

Updated: रविवार, 24 अप्रैल 2022 (12:32 IST)
विश्व के बदलते हुए परिदृश्य के साथ ही अनेकानेक संकटों से समाज जूझ रहा है। स्वास्थ्य सुविधाओं की मूलभूत कमीं से जहां आम आदमी को प्रतिदिन दो- चार होना ही पड़ता है।

वहीं स्वतन्त्रता के सात दशक पूरे हो जाने के बावजूद भी देश में  स्वास्थ्य सुविधाओं- अस्पतालों, चिकित्सकों, अत्याधुनिक तकनीकी, पैरामेडिकल स्टॉफ,लैब इत्यादि का विकास अभी भी भारत की आबादी के हिसाब से अपर्याप्त ही है।

भारत की सामाजिक- आर्थिक- भौगोलिक विषमताओं के कारण समय पर आम लोगों को समुचित- सस्ता एवं सुलभ उपचार मिल पाना किसी दिवा स्वप्न से कम नहीं है।

जहां अन्य बीमारियों के उपचार के लिए किसी भी प्रकार से उपचार तो सम्भव हो ही जाता है। किन्तु वहीं मानसिक स्वास्थ्य को लेकर सरकार-समाज व स्वास्थ्य क्षेत्र के स्तर पर अभी भी एक तरह की निरंकता या न्यूनता की स्थिति देश भर में देखने को मिलती है।

सुख-सुविधाओं की बढ़ती हुई मांगों, बदलती हुई परिस्थितियों व जीवनशैली के कारण समाज में अवसाद, तनाव व आत्महत्या जैसे मामलों की बढ़ोत्तरी अप्रत्याशित तौर पर हो रही है।

मानसिक अस्वस्थता के बढ़ते हुए मामले एक विकराल संकट के तौर पर देश एवं समाज के समक्ष बड़ी चुनौती बनकर उभर रहे हैं। लेकिन देश भर में मानसिक स्वास्थ्य एवं मनोरोगियों के उपचार की स्थिति अपनी दयनीय स्थिति में है।

अवसाद, चिन्ता, तनाव व उसके कारण अन्तिम परिणति के तौर पर आत्महत्या के बढ़ते हुए ग्राफ की रोकथाम के लिए समाज व सरकार के प्रयासों का आंकलन करने पर जो सच्चाई हमारे सामने उपस्थित होती है। वह देश की व्यवस्था को मुंह चिढ़ाने लगती है।

मानसिक अस्वस्थता के कारण देश केवल सामाजिक तौर पर ही नहीं बल्कि कुशल मानव संसाधन के समुचित उपयोग न कर पाने के कारण आर्थिक सहित कई तरह की अन्य हानियों को उठाता है।

मानसिक अस्वस्थता के कारण ही व्यक्ति कार्यक्षेत्र में अपनी कार्यक्षमताओं का उत्कृष्ट प्रदर्शन नहीं कर पाता है।
दौड़ती भागती जिन्दगी, डिजिटल गैजेट्स के प्रयोग की लत, वर्क फ्रॉम होम, रिश्तों की अनबन, किसी अनहोनी, दुर्घटना, अकेलापन, शारीरिक गतिविधियों जैसे- खेलकूद, योग,व्यायाम की कमीं व अपनी समस्याओं को अभिव्यक्त न कर पाने के कारण  मानसिक अस्वस्थता समाज को लगातार क्षति पहुंचा रही है। वहीं समाज में मनोरोगों के उपचार को लेकर उपेक्षा के भाव तथा मनोरोगियों के प्रति समाज की संकीर्ण विचारधारा व संकोच ने इस समस्या को और भी अधिक जटिल बना दिया है।

मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2015 - 16  के अनुसार मानसिक समस्याओं से प्रभावित लगभग 99 प्रतिशत भारतीय स्वास्थ्य देखभाल तथा उपचार को आवश्यक नहीं मानते हैं। इसके साथ ही प्रति एक लाख की आबादी पर मानसिक स्वास्थ्य कर्मचारियों की संख्या का अनुपात भी बेहद चिंताजनक है।

देश की प्रति एक लाख की आबादी पर मात्र- मनोचिकित्सक (0.3), नर्स (0.12), मनोवैज्ञानिक (0.07) और सामाजिक कार्यकर्ता (0.07) उपलब्ध हैं। मानसिक स्वास्थ्य को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट भी हमारी व्यवस्था पर गम्भीर प्रश्नचिह्न उठाती है।

उस रिपोर्ट के अनुसार भारत की लगभग 7.5 प्रतिशत आबादी किसी न किसी प्रकार की मानसिक समस्याओं से जूझ रही है। तो वहीं विश्व भर में मानसिक और न्यूरोलॉजिकल बीमारियों की समस्याओं से पीड़ित लोगों में भारत की जनसंख्या का तकरीबन 15 प्रतिशत हिस्सा शामिल है।

इतना ही नहीं मानसिक बीमारियों से अब बच्चे भी अछूते नहीं रह गए हैं। मोबाइल फोन एवं डिजिटल गैजेट्स, गेमिंग की लत व एकल परिवार के बढ़ते चलन के चलते बच्चे भी तनावग्रस्त होते जा रहे हैं। इस बढ़ते हुए खतरे को भांपने व उसका उपचार करने की बजाय समाज के स्तर पर अभी भी बच्चों/ किशोरों के अवसाद,एकाकीपन को स्वीकारने व उसके उपचार को लेकर कोई संजीदगी देखने को नहीं मिलती है।

अक्टूबर 2021 में यूनीसेफ द्वारा बच्चों की मानसिक सेहत पर आधारित रिपोर्ट ' द स्टेट ऑफ वर्ल्ड्स चिल्ड्रेन-2021 ऑन माई माइंड ' के अनुसार  भारत में हर सात में से एक किशोर डिप्रेशन से प्रभावित है,किन्तु भारत में बच्चे अपनी मानसिक समस्याओं के समाधान को लेकर बिल्कुल ही नहीं सोचते। यूनीसेफ द्वारा जारी इस रिपोर्ट में पच्चीस देशों के लगभग बीस हजार बच्चों के बीच सर्वेक्षण किया गया था।

इस सर्वेक्षण में भारत में 15 से 24 आयु वर्ग के मात्र 41 प्रतिशत बच्चों ने ही मानसिक समस्याओं से गुजरने के दौरान चिकित्सकीय मदद लेने की बात कही थी, जबकि अन्य इक्कीस देशों के तकरीबन 83 प्रतिशत बच्चे मानसिक समस्याओं के निवारण के लिए परामर्श एवं उपचार की बात को लेकर गम्भीर दिखे।

देश भर में मानसिक रोगों के निदान के उद्देश्य से भारत सरकार द्वारा चलाए जा रहे मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम तथा सन् दो हजार सत्रह में मानसिक स्वास्थ्यकर अधिनियम व सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय द्वारा शुरु की गई 'किरण हेल्पलाइन' का जमीनी क्रियान्वयन  भारत की आबादी को मानसिक समस्याओं से निजात दिला पाने में कारगर सिध्द नहीं हो पा रहा है।

राज्यों द्वारा भी मानसिक स्वास्थ्य को लेकर कोई खास तैयारी नहीं दिखती है। मानसिक स्वास्थ्य पर राज्यों द्वारा जारी बजट भी एक प्रतिशत या उससे कम ही है। संसद की बहसों एवं राज्य विधानसभाओं सहित आम जनमानस के बीच मानसिक स्वास्थ्य को लेकर कोई विचार -विमर्श मुख्य धारा में देखने को नहीं मिलता है। 
देश के मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को लेकर ये समस्त आंकड़े व उपेक्षापूर्ण सामाजिक व्यवहार बहुत बड़ी चुनौती बनकर सामने आ खड़े हैं। एक समाज के रुप में हमें यह स्वीकार करना पड़ेगा कि मानसिक समस्याएं भी अन्य बीमारियों की तरह ही हैं जिससे कोई भी प्रभावित हो सकता है। और उपचार के माध्यम से इनसे निजात पाया जाना संभव है।

आवश्यकता सिर्फ़ इन्हें स्वीकारने व उपचार के लिए आगे बढ़ने की है। ऐसे में आवश्यक है कि मानसिक स्वास्थ्य को लेकर समाज व सरकार आत्मचिंतन करते हुए ठोस कदम उठाएं। उपचार हेतु बेहतर इन्फ्रॉस्ट्रक्चर के निर्माण तथा समाज में मानसिक अस्वस्थता को लेकर स्वीकार्यता व उसके उपचार के लिए बेहतर व्यवस्था निर्मित की जा सके। ताकि देश को मानसिक अस्वस्थता के प्रकोप से बचाया जा सके। इसके लिए जहां भारत की परम्परागत योग, ध्यान प्रणाली उपयोगी सिध्द होंगी वहीं आपसी बातचीत, परामर्श व उपचार की समुचित  व्यवस्था के सामूहिक प्रयासों के द्वारा इस लड़ाई को आसानी से जीता जा सकेगा।

(आलेख में व्‍यक्‍त विचार लेखक के निजी अनुभव हैं, वेबदुनिया से इसका कोई संबंध नहीं है।)
लेखक के बारे में
कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

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