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कहां हो? मैं बैंक/डाक घर में हूं

Updated: सोमवार, 21 नवंबर 2016 (12:21 IST)
500 रूपए और 1000 रूपए के करेंसी नोट लीगल टेंडर नहीं रहेंगे, यानि ये मुद्राएं कानूनन अमान्य होंगी। पुराने नोट 10 नवंबर से 30 दिसंबर तक अपने बैंक या डाक घर के खाते में बिना किसी सीमा के जमा करवा सकते हैं, आपकी धन राशि आपकी ही रहेगी और बाकि करेंसी नियमित रहेगी की खबर ने चौंका दिया । भ्रष्टाचार, नकली करेंसी रोकने आदि हेतु यह कारगर कदम है किंतु व्यवहारिक परेशानी का सामना आम लोगों से लेकर खास लोगों को करना पड़ सकता है। 

 
टीवी की खबरें प्रसारित हो रही हैं और फेसबुक-वाट्सअप पर इसके त्वरित समाचार के लिए और समाधान हेतु घर परिवार की नजरें ताजे समाचार हेतु मानों पलक पावड़े लिए बैठी हुई हैं। तभी घर के अंदर से पति महोदय को पत्नी ने आवाज लगाई - नहाकर बाजार से सब्जी-भाजी ले आओ, किंतु पति महोदय को लगा फेस बुक का चस्का। वे फेस बुक के महासागर में तैरते हुए मदमस्त हुए जा रहे। बच्चे पापा से स्कूल ले जाने की जिद कर रहे थे कि स्कुल में देर हो जाएगी। काम की सब तरफ से पुकार हो रही मगर जवाब बस एक मिनिट। नाइस, वेरी नाइस की कला में माहिर हो गए थे। मित्र की संख्या में हजारों के इजाफे से वे मन ही मन खुश थे किंतु पड़ोसी को चाय का नहीं पूछते। इसका यह भी कारण हो सकता उन्हें फुर्सत नहीं हो। दोस्तों में काफी ज्ञानी हो गए थे। 
 
मित्र भी सोचने लगे कि यार ये इतना ज्ञान कहां से लाया? इससे पहले तो ये हमारे साथ दिन भर रहता और हमारी देखी हुई फिल्म की बातें समीक्षा के रूप में सुनता रहता था। एक दिन मोहल्ले वाले मित्रों ने सोचा इनके घर चल कर के पता किया जाए, ठंड में गरमागरम चाय भी मिल जाएगी। मित्रों ने घर के बाहर लगी घंटी दो चार बार बजाई। अंदर से आवाज आई जरा देखना कौन आया है। उन्हें उठ कर देखने की भी फुरसत नहीं मिल रही थी। दोस्तों ने कहा यार आज कल दिखता ही नहीं क्या बात है। हमने सोचा कहीं बीमार तो नहीं हो गया हो इसलिए खबर लेने और करेंसी 500 ओर 1000 रूपये बंद होने की खबर देने भी आए हैं ।पता नहीं दिख नहीं रहा तो शायद खबर मालूम न हो।
 
घर में देखा तो भाभीजी वाट्सअप में अपने रिश्तेदारों को त्योहारों की फोटो सेंड करने में सर झुकाए तल्लीन और बच्चे भी इसी में लगे थे। अब ऐसा लग रहा था की फेसबुक और वाट्सअप में जैसे मुकाबला हो रहा हो। घर के काम का समय मानो विलुप्तता की कगार पर जा खड़ा हुआ हो। सब जगह चार्जर लटक रहे थे। मोबाइल यदि कहीं भूल से रख दिया और नहीं मिला, तो ऐसा लगता जैसे कोई अपना लापता हो गया हो और दिमाग में चिड़चिड़ापन, हिदायतें उभर कर आना  मानों रोज की आदत बन गई हो। 
 
चार्जिंग करने के लिए घर में ही होड़ होने लगी। बैटरी लो हो जाने से सब एक-दूसरे को सबुत पेश करने लगे। वाकई इलेक्ट्रॉनिक युग में प्रगति हुई, किंतु लोग रिश्तों और दिनचर्या में काम ध्यान देकर अधिक समय और सम्मान फेसबुक और वाट्सअप और मोबाइल पर केंद्रित करने लगे हैं। उधर 500 और 1000 हजार की करेंसी बदलवाने की चिंता और नए मिलने वाले नोटों का इंतजार, जिससे घर के रुके काम सुचारू रूप से गति पकड़ ले। गांव-शहर में करेंसी बदलवाने को ले जाते हुजूम से बैंक और डाकघर चर्चित हुए, वहीं कोई परिचित किसी से पूछे कि आप कहां हो, वो एक ही पता बता रहा है बैंक /डाक घर में हूं। 

लेखक के बारे में
संजय वर्मा 'दृष्ट‍ि'
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