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इंदौर को इंदौर (अहिल्या नगरी) ही रहने दो

Updated: मंगलवार, 13 फ़रवरी 2018 (15:42 IST)
मां अहिल्या की नगरी इंदौर विकास के पथ पर अग्रसर है और वर्तमान दशक में जोरों से सफाई अभियान चल रहा है। चहुं दिशाओं में इंदौर की भुजाएं पसर रही हैं। आबादी बढ़ रही है और ट्रैफिक बढ़ रहा है।
 
यूपी, बिहार, राजस्थान, पंजाब, दक्षिण भारत, हिमाचल, आंध्रप्रदेश समेत तमाम राज्यों के नागरिकों ने अहिल्या नगरी इंदौर में बसकर इसकी शोभा को सुशोभित किया है। अब काफी समय से (संभवत: मिलें बंद होने के बाद से) इंदौर को मिनी बॉम्बे या लघु मुंबई बनाने की बात भी चलती रहती है।
 
मुंबई, महाराष्ट्र प्रदेश का महानगर है। इंदौर भी मप्र के महानगरों में गिना जाने लगा है किंतु अभी इसमें मुंबइयापन कुछ बाकी है। अपराध होते हैं, मगर इनका प्रतिशत 100 के अंदर ही रहता है। मुंबई के साथ शायद ऐसा नहीं होगा। मुंबई फिल्मी नगरी है तो इंदौर में भी गली-गली में हीरो-हीरोइनें हैं। 
 
यह बात अलग है कि आधुनिकता के अंधानुकरण में इंदौर की युवा या किशोर पीढ़ी में बुजुर्गों, गुरुजनों, माता-पिता के चरण स्पर्श की प्रवृत्ति लगभग 5 से 7 प्रतिशत रह गई है, मगर आज हर युवा की जेब में नशे की पुड़िया, ड्रिंक, वाइन, सिगरेट, झाड़फानूस बनी हेयर स्टाइल और फटे-फैशन के परिधान सुशोभित होते दिख जाते हैं।
 
लड़कियों की तो बात ही निराली है। कहा जाता है कि होलकरकाल से लेकर सन् 1975 तक इंदौर की लड़कियां आधुनिक जरूर थीं, मगर आधुनिकता का उल्लंघन या कहा जाए कि मर्यादा का उल्लंघन शून्य था। आज तो क्लबों में लड़कों के साथ कदम से कदम मिलाकर नशाखोरी कर रही हैं यानी इंदौर को 'मिनी मुंबई' कहा जाने लगा है, तो यह गलत नहीं। बस शायद कुछ सालों बाद इंदौर भी मुंबई ही बन जाए।

 
वैसे मुंबई से कोई बुराई नहीं, न ही मुंबई से हमें कुछ ऐतराज है, मगर वर्तमान स्थितियों को देखते हुए विचार आता है कि जो नगरी अपनी सहिष्णुता, सद्भाव, समझदारी, दरियादिली, भाईचारे आदि-इत्यादि के लिए प्रसिद्ध है, कल को मुंबई बनने पर पड़ोसी, पड़ोसी से अनजान रहेगा। वैसे इसकी शुरुआत तो हो चुकी है। इंदौर का विकास जरूरी है, करिए। इंदौर को मॉडर्न बनाना है, बनाइए, मगर इसका ऐतिहासिक खिताब या कहा जाए कि विश्वभर में सुशोभित 'अहिल्या नगरी' की उपाधि को धूमिल मत करिए।

 
अहिल्या नगरी में दया, प्रेम, भाईचारा, जातीय-सामाजिक एकता के दर्शन होते थे। त्योहारों के समय हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई के अपनत्व की औपचारिकता नहीं थी, बल्कि वास्तविकता नजर आती थी। अहिल्या नगरी ने कभी किसी का तिरस्कार नहीं किया और सबको बसाने में कोई कसर नहीं रखी और आज भी वैसा ही है किंतु मॉडर्न बनने में दिल के जज्बातों को दरकिनार कर दिया गया है।
 
इंदौर को इंदौर (मां अहिल्या नगरी) ही रहने दिया जाए, इसका ये मतलब नहीं कि आधुनिकता की दौड़ में दौड़ न लगाई जाए, लगाई जाए, मगर किसी मनभेद या मतभेद से नहीं बल्कि एकता, भाईचारे और सौहार्द से। इंदौर को बिगाड़ो मत!
लेखक के बारे में
अनिल शर्मा

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