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आत्महीनता के ब्रांड एम्बेसेडर

Updated: शनिवार, 28 अक्टूबर 2017 (17:32 IST)
हर आदमी अपनी सबसे प्यारी चीज़ के दैनिक दर्शन दुनिया को करवाना चाहता है और बिना किसी "अरेस्ट वारंट" के वाहवाही को गिरफ्तार करना चाहता है। वैसे एक देश के तौर पर हमारे पास दिखाने और छुपाने के लिए काफी चीज़ें है, लेकिन इन सबके इतर आत्महीनता की प्रदर्शनी हम सबसे ज्यादा लगाते हैं। आत्महीनता वो अंतर्वस्त्र है जिसे दिखाकर हम भारतीय सबसे ज्यादा एक्सपोज करते हैं।

आत्महीनता की पिच पर हम पारी घोषित किए बिना लगातार बैटिंग कर सकते हैं और इसके लिए हमें पिच क्यूरेटर की मदद की भी जरूरत नहीं होती है। आत्महीनता हमारे लिए लक्स-कोजी की तरह आरामदायक है और हम हमेशा अपना लक पहन के चलते और रेंगते हैं। आत्महीन देश और उसके नागरिक बहुत आत्मसंतोषी प्रवृति के पाए जाते हैं। उनकी हसरतें, स्वाभिमान रेखा के काफी नीचे आराम से जीवन-यापन कर लेती हैं। आत्महीनता का हाजमा, इज्जत का राजमा खाने की इजाज़त नहीं देता है लेकिन वो दूसरों के द्वारा दरियादिली दिखाकर फेंकी गई  सम्मान और तारीफ की झूठन को बड़े अधिकारपूर्वक हड़प कर लेता है।
 
आत्महीनता ज्यादा इज्जत अफोर्ड नहीं कर सकती है, उसके फेफड़े आत्मसम्मान की ऑक्सीजन को अपने आगोश लेने से कतराते हैं। आत्महीनता के बूटे जब कानों में सजने लगते हैं तो स्वाभिमान का नाम सुनते ही अपराधबोध महसूस होने लगता है। इसलिए जब देश का एक मुख्यमंत्री अमेरिका जाकर अपने प्रदेश की सड़कों को बेहतर बताता है तो हम इसे स्वयंभू राष्ट्र के तौर पर आत्महीनता के संवैधानिक अधिकार पर आघात समझते हैं और मुख्यमंत्री के चेहरे पर उन्हीं के राज्य की सड़कों की कालिख पोत देते हैं ताकि भविष्य में कोई चुना हुआ जनप्रतिनिधि इस तरीके की घटिया हरकत कर सात समंदर पार देश का नाम मिट्टी में मिलाने की हिम्मत नहीं कर सके। जब तक अमेरिका खुद ना कह दे कि हमारी सड़कें बेहतर हैं, तब तक हम अपने आपको बेहतर मानने की हिमाकत कैसे कर सकते हैं? यह हमारी आत्महीनता की गर्वीली विरासत और संस्कृति के विरुद्ध है और हर मंच से ऐसे दुस्साहस के खिलाफ आवाज बैठे गलों से भी उठनी चाहिए। 
 
देश के आकाओं को समझना होगा कि हम अच्छे और बेहतर हैं या नहीं, यह हम स्वयं के विवेक से निर्धारित करने वाले कौन होते हैं। यह स्वतंत्रता सदियों की गुलामी के बाद हम खो चुके हैं, जिसका रिकॉर्ड "खोया-पाया" विभाग के पास भी नहीं है। हमारा चप्पा-चप्पा विदेशी ठप्पा पाने के लिए तरसता रहता है। खुद के अप्रूवल के लिए बाहरी मान्यता हमारे लिए संजीवनी की तरह होती है जो हमारे अस्तित्व को "दूधो नहाओ और पूतो फलो" का आशीर्वाद देती है।
 
योग हो या आयुर्वेद, जब तक पश्चिमी देशों ने इनको मान्यता देकर धन्य नहीं किया तब तक ये विधाएं केवल हमारी हिकारत का आतिथ्य स्वीकार करती रहीं, हमने कभी भी इनको महानता की शॉल ओढ़ाकर और अपनत्व का श्रीफल देकर इनका सत्कार समारोह नहीं किया। बॉलीवुड की कोई फिल्म कितने भी करोड़ की जेब क्यों ना काट ले, हमारे कान पर जूं या जेब पर डायनासोर नहीं रेंगता है। लेकिन जब कोई ऑस्कर में नामांकित फि‍ल्म हमारी गरीबी का वैश्विक चित्रण कर दे, तो हमारे वहीं रोंगटे खड़े हो जाते हैं जो सिनेमा हॉल में 52 सेकंड के राष्ट्रगान के सम्मान में खड़े होने से मना कर देते है। 
 
हमारी अर्थव्यवस्था पटरी पर है या घुटनों पर, इसकी सूचना आत्महत्या करते हमारे किसान नहीं बल्कि विश्वबैंक और अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष की रोषपूर्ण रैंकिंग देती है। देश में रहते हुए हम किसी का मूल्य पहचाने या ना पहचाने लेकिन गूगल या माइक्रोसॉफ्ट का CEO किसी भारतीय के बनने पर अपनी कॉलर और आवाज ऊंची करते हुए उसको भारतीय मूल का बताना नहीं भूलते हैं। भले ही हर रोज, सूर्य पूर्व से उदय होकर पश्चिम में अस्त हो जाता हो, लेकिन हमारे लिए सम्मान का सूर्य पश्चिम से ही उदित होता है।
लेखक के बारे में
अमित शर्मा
पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट एंड कंपनी सेक्रेटरी। समसामयिक विषयों पर व्यंग्य लेखन.... और पढ़ें

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