मां वाग्देवी का मंदिर, भोजशाला मध्य प्रदेश के धार में स्थित केवल पत्थरों का ऐतिहासिक ढांचा नहीं है, बल्कि यह भारत की उस ज्ञान परंपरा का जीवंत साक्ष्य है, जिसे सदियों के संघर्ष और आक्रमणों ने मिटाने का विफल प्रयास किया। आज मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ का हालिया निर्णय भारतीय न्यायिक इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय की तरह है, जिसने वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर यह स्पष्ट कर दिया कि अतीत के सत्य को लंबे समय तक झुठलाया नहीं जा सकता। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की व्यापक और तकनीक-आधारित रिपोर्ट ने उन सभी पर्दों को हटा दिया है, जिन्होंने दशकों तक इस विवाद को उलझाए रखा था। यह निर्णय केवल एक कानूनी जीत नहीं है, बल्कि यह भारत की उस आध्यात्मिक चेतना की पुनर्स्थापना है, जो 11वीं सदी के विद्वान, प्रतापी राजा भोज के स्वप्निल भारत की आधारशिला थी।
ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो मालवा के परमार वंश के ओजस्वी शासक राजा भोज ने 1034 ईस्वी में धार को विद्या की राजधानी के रूप में स्थापित किया था। राजा भोज द्वारा रचित- सरस्वती कंठाभरण और उनसे जुड़ी किंवदंतियों जैसे भोज प्रबंध में उल्लेख मिलता है कि मां वाग्देवी की कृपा उन पर सदैव रही। विशेष रूप से धार स्थित सरस्वती मंदिर और भोजशाला के निर्माण के संदर्भ में लोकमान्यता है कि देवी ने उन्हें स्वप्न में दर्शन या प्रेरणा दी थी। फलस्वरूप उन्होंने धार में सरस्वती सदन या भोजशाला की स्थापना की। यह एक ऐसा विश्वविद्यालय था जहां व्याकरण, खगोल शास्त्र, ज्योतिष, दर्शन, कला और साहित्य की अविरल धारा बहती थी। यह स्थान नालंदा और तक्षशिला की भांति ही वैश्विक ख्याति प्राप्त था। यहां मां सरस्वती की स्फटिक की दिव्य प्रतिमा स्थापित थी, जिसके समक्ष बैठकर देश-विदेश के विद्वान और विद्यार्थी ज्ञान की साधना व शास्त्रार्थ करते थे।
13वीं और 14वीं शताब्दी के कालखंड में जब भारत की सांस्कृतिक धरोहरों पर हमले हुए, तो धार की यह ज्ञानस्थली भी आक्रांताओं के निशाने पर आई।अलाउद्दीन खिलजी (1305 ई.), दिलावर खान (1401 ई.), महमूद खिलजी (1436-1469 ई.) जैसे आक्रांताओं ने इस मंदिर के स्वरूप को नष्ट करने और इसके अवशेषों पर मस्जिद का वैकल्पिक ढांचा खड़ा करने का जो कृत्य किया, वह इतिहास के सबसे दुखद अध्यायों में से एक है। इन्होंने राजा भोज द्वारा उकेरे गए शिलालेखों को ढंक दिया और मंदिर के खंभों पर जबरन बाहरी चिन्ह अंकित किए, ताकि इसकी मूल पहचान को मिटा सके।
वर्तमान समय में जब आधुनिक विज्ञान और न्याय का मिलन हुआ, तो एएसआई की वैज्ञानिक रिपोर्ट ने दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया। ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार (जीपीआर) और कार्बन डेटिंग जैसी उच्च स्तरीय तकनीकों ने यह प्रमाणित किया कि वर्तमान संरचना के नीचे छिपे हुए आधार और स्तंभ स्पष्ट रूप से प्राचीन हिंदू मंदिर वास्तुकला के हैं। खुदाई में मिले नक्काशीदार पत्थर, देवी-देवताओं के अवशेष और संस्कृत के श्लोक इस बात का निर्विवाद प्रमाण हैं कि यह स्थान मूलतः और पूर्णतः एक सरस्वती मंदिर, शिक्षा का केंद्र ही था।
न्यायालय का यह फैसला कि यहां हिंदुओं को पूजा का पूर्ण अधिकार है, वास्तव में करोड़ों सनातनियों की उस आस्था का सम्मान है जो सदियों से इस स्थान को अपनी माता का मंदिर मानते है। यह निर्णय स्पष्ट करता है कि मध्यकालीन बर्बरता को आधुनिक लोकतांत्रिक भारत में वैध नहीं ठहराया जा सकता।
भोजशाला की मुक्ति का यह अभियान तब तक अधूरा है, जब तक मां वाग्देवी की वह मूल प्रतिमा भारत वापस नहीं आ जाती। 1875 में अंग्रेज अधिकारी मेजर किनकेड द्वारा इस प्रतिमा को चोरी करके ले जाना और आज भी उसका लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम की गैलरी में होना, हर भारतीय के स्वाभिमान को कचोटता है। भले ही भारत और हम भारतीय 1947 में राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त कर चुके हो, लेकिन हमारी आध्यात्मिक, सांस्कृतिक स्वतंत्रता आज भी लंदन के संग्रहालयों में कैद है। पिछले कुछ वर्षों में भारत सरकार ने कूटनीतिक स्तर पर जिस तरह से विदेशों से सैकड़ों चोरी हुई प्राचीन धरोहरें वापस लाने में सफलता पाई है, उससे यह उम्मीद जागी है कि अब वाग्देवी की घर वापसी का समय भी निकट है। यह केवल एक कलाकृति की वापसी नहीं, बल्कि धार की खोई हुई आध्यात्मिक ऊर्जा की पुनर्स्थापना होगी।
इस ऐतिहासिक मोड़ पर समाज और प्रशासन दोनों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। यह समय किसी सांप्रदायिक वैमनस्यता का नहीं, बल्कि ऐतिहासिक भूलों के सुधारकर उत्सव मनाने का है। उच्च न्यायालय ने जिस प्रकार मुस्लिम पक्ष के लिए भी न्यायसंगत दृष्टिकोण अपनाया है, और कहा कि वे अपने लिए दूसरी जगह जमीन लेकर सूफी संत कमाल मौला की मस्जिद बना सकते है, यह भारतीय संविधान की खूबसूरती है।
अब, भारत सरकार का अगला कदम नालंदा विश्वविद्यालय की तरह ही भोजशाला के भव्य जीर्णोद्धार और इसे पुनः एक वैश्विक ज्ञान केंद्र के रूप में विकसित करने का होना चाहिए। भोजशाला का पुनरुद्धार केवल एक धार्मिक कार्य नहीं है, बल्कि यह राजा भोज की उस विरासत को सम्मान देना है जिन्होंने शिक्षा और कला को राष्ट्र की उन्नति का आधार माना था।
अंततः भोजशाला का संघर्ष अब अपने तार्किक अंत की ओर बढ़ रहा है। सत्य की विजय के इस संकल्प में अब पूरे राष्ट्र को एक स्वर में वाग्देवी के आगमन की मांग करनी चाहिए। जिस दिन मां सरस्वती की मूल प्रतिमा धार की पावन धरा पर पुनः प्रतिष्ठित होगी उस दिन भोजशाला के प्रांगण में पुनः वेदों और व्याकरण के सूत्रों का उच्चारण होगा, उसी दिन मालवा का सांस्कृतिक पुनर्जागरण पूर्ण होगा। यह निर्णय भविष्य की पीढ़ियों को संदेश देता है कि सत्य भले ही समय की धूल में दब जाए, लेकिन वह कभी समाप्त नहीं होता। न्याय की यह मशाल, एक नए ज्ञानोदय की ओर ले जाने को तत्पर है।