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वर्तिका के काव्य संग्रह ‘रानियां सब जानती हैं’ का विमोचन

वर्तिका के काव्य संग्रह ‘रानियां सब जानती हैं’ का विमोचन - Vartika Nanda Book Release
-सुशांत झा
दिल्ली। पुस्तक मेले में यूं तो बहुत सारे किताबों का विमोचन होता रहता है, गोष्ठियां होती हैं लेकिन कुछ विमोचन ऐसे होते हैं जो किसी अभियान की शक्ल ले लेते हैं। वरिष्ठ पत्रकार-कथाकार वर्तिका नन्दा की वाणी प्रकाशन से आई पुस्तक “रानियां सब जानती हैं” का विमोचन ऐसा ही अवसर था जिसमें ‘रानियां भी बोलें, कानून पट्टी खोलें’ नाम से एक अभियान की शुरुआत भी की गई। इस अवसर पर एसिड हमलों की शिकार कुछ महिलाएं और कार्यकर्ता भी उपस्थित थे और एक एसिड अटैक पीड़िता ने कविता का पाठ भी किया।
 
रानियां सब जानती हैं उन रानियों पर लिखा गया कविता संग्रह है, जिनमें रानियों के पास सब कुछ था सिवाय कुछ कहने की आजादी के। उनके पास सच तो थे लेकिन उसे बोलने की आजादी न थी। ये कविताएं बताती हैं कि चोट सिर्फ शारीरिक, आर्थिक और सामाजिक स्तर पर ही नहीं पड़ती बल्कि मानसिक स्तर पर भी दी जाती है। इस पूरे खेल में गरीब और संभ्रांत वर्ग की महिलाओं में कोई फर्क नहीं होता। कई बार तो रानियों सी हैसियत वाली महिलाओं का शोषण उनसे ज्यादा ताकतवर पुरुष करते हैं जिनसे लड़ना और भी मुश्किल है।



  • हर रानी के पास सच है, लेकिन सच की चाबी किसी राजा के पास है-वर्तिका नंदा
  • किताब के माध्यम से ‘रानियां भी बोले, कानून पट्टी खोले’ नाम के अभियान की शुरुआत
  • बदलाव अंदर से लाना होगा, किसी न किसी को पहल करनी होगी-तेजिंदर सिंह लूथरा
  • निर्भया से लेकर एसिड अटैक से पीड़ित, बदायूं के पेड़ पर लटका दी गईं और वेश्यावृत्ति करने को मजबूर महिलाओं के नाम हैं - कविताएं

बकौल लेखिका वर्तिका नन्दा, ‘समाज में हर रानी के पास एक सच है, लेकिन उस सच की चाबी किसी राजा के पास है। इस कविता संग्रह में कुछ कविताएं सुनंदा पुष्कर पर हैं, कुछ जीबी रोड में वेश्यावृत्ति कर रही महिलाओं पर, कुछ एसिड अटैक को झेल चुकी युवतियों पर तो कुछ उन दो लड़कियों के नाम पर हैं जो बदायूं जिले के एक गांव में पेड़ पर लटकी मिली थीं। वे सब किसी न किसी की रानियां थीं, लेकिन उनके पास सच बोलने की आजादी नहीं थी’।

ऐसे मुद्दों को उठाने में मीडिया का रोल अहम रहा है और मीडिया ने स्त्रियों को समाज में उनको उनका उपयुक्त स्थान दिलाने की दिशा में काफी प्रोत्साहित भी किया है। बीएजी फिल्म्स की प्रबंध निदेशक अनुराधा प्रसाद ने कहा कि पहले का मीडिया थोड़ा अलग था लेकिन आज का बिल्कुल अलग है और इसमें महिलाओं का बड़ा योगदान है। “अगर महिलाएं सामने न आतीं तो कुछ नहीं होता। राजनीतिक दल सिर्फ वादे करते हैं, महिला आरक्षण की मांग दशकों से लटकी हुई है, लेकिन कोई कुछ नहीं करता। देखा जाए तो समाज में तो हमें संस्कार के नाम पर हमेशा सीख और उपदेश मिलते हैं लेकिन मीडिया ने एक हद तक हमारे आत्मविश्वास को बढावा दिया है।”
 
दिल्ली सरकार में वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी रश्मि सिंह ने कहा कि महिलाओं का उत्पीड़न ऐसा मामला है जिसका दायरा सरकारी तंत्र से परे जाकर भी है। यह एक समाजिक और सभ्यतागत मुद्दा भी है। शोषण सिर्फ शाऱीरिक या यौन नहीं होता, शोषण तो भावनाओं का भी होता है। लेकिन जब महिलाएं चुप्पी साध लेती हैं तो लोगों को और बढावा मिलता है। उन्हें अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़नी ही होगी।
 
महिलाओं के उत्पीड़न के खिलाफ बहुत सारे कानून बने हैं लेकिन उनका उत्पीड़न रुक नहीं रहा है। जाहिर है इसकी जड़ें कानून से परे कहीं समाज में हैं। इस अवसर पर बोलते हुए वरिष्ठ पुलिस अधिकारी तेजेंद्रसिंह लूथरा ने कहा कि शुरुआत तो अंदर से करनी होगी। किसी न किसी को आवाज उठानी होगी। कई बार महिलाएं ही महिलाओँ का शोषण करती हैं। हमें उन कारणों की तह तक जाना होगा। महिलाओं ने दशकों तक आंदोलन कर, काफी तकलीफ सहकर अपने लिए कुछ कानून बनवाए हैं- हमें ये देखना होगा कि उन कानूनों का सार्थक उपयोग हो।
वरिष्ठ कवि लक्ष्मीशंकर वाजपेयी ने कहा कि बलात्कार की वजहें कम कपड़ों में नहीं बल्कि रुग्न मानसिकता में छुपी होती हैं। हमें बीमारी को सही तरीके से देखना होगा। उन्होंने कहा कि मानसिकता, परंपरा और आधुनिकता ये तीन प्रमुख बाधाएं महिला सशक्तिकरण की राह में है और “लिबरेट” होने की आवश्यकता महिलाओं को नहीं-बल्कि पुरुषों को है।
 
जब स्टॉप एसिड अटैक टीम से जुड़ीं और खुद भी एसिड अटैक झेल चुकीं और अब इसके खिलाफ आंदोलनरत सोनिया कविता पाठ करने के लिए मंच पर आईं तो मंच संचालन कर रहीं वरिष्ठ पत्रकार ऋचा अनिरुद्ध ने ठीक ही कहा कि इन महिलाओं के लिए “विक्टिम” (पीड़िता) शब्द का उपयोग ठीक नहीं हैं, ये महिलाएं तो “सरवाइवर” और “फाइटर” हैं। सोनिया ने वर्तिका नन्दा के इस कविता संग्रह से एक कविता पढ़कर सुनाया-
 
सपनों के शहजादे की तलाश का अंत हो चुका है अब
तमाम चेहरे
नौटंकियां
मेले
हाट
तमाशे
दर्द, अपमान, मोहल्ले, पुलिस और कचहरियां
देखने के बाद
अपना चेहरा बहुत भला लगने लगा है
सुंदर न भी हो
पर मन में एक सुर्ख लाल बिंदी है अब भी
हवन का धुंआ
और स्लेट पर पहली बार उकेरा अपना नाम भी
सब सुंदर है
सत्य भी, शिव भी और अपना अंतस भी
काश,
यह प्यार जरा पहले कर लिया होता
 
इस काव्य संग्रह द्वारा शुरू किए गए अभियान को समर्थन देने और मुकाम तक पहुंचाने का वादा सभी अतिथियों ने किया। इस किताब में रेखांकन प्रसिद्ध कलाकार धर्मेंद्र पारे ने किया है। वर्तिका नन्दा की इससे पहले प्रकाशित किताबें – तिनका तिनका तिहाड़ और थी. हूं..रहूंगी..भी काफी चर्चित हुईं थीं। पुस्तक विमोचन समारोह का धन्यवाद ज्ञापन वाणी प्रकाशन के प्रबंध निदेश अरुण माहेश्वरी ने किया।