क्या आपको याद है बचपन में मकर संक्रांति हमेशा 14 जनवरी को ही आती थी? लेकिन अब कैलेंडर बदल रहा है। इस साल, यानी 2026 में भी, ग्रहों के राजा सूर्य वाराणसी पंचांग के अनुसार 14 जनवरी की रात 9:39 बजे धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करेंगे। हालांकि पंचांग भेद से द्रिक पंचांग के अनुसार दोपहर काल में 03:13 और एस्ट्रोसेज अनुसार दोपहर 02:49 पर सूर्य का मकर राशि में गोचर होगा। इस मान से जो लोग उदयातिथि को मानते हैं वे 15 जनवरी को ही मकर संक्रांति मनाएंगे। चूंकि सूर्य का प्रवेश रात में हो रहा है, इसलिए संक्रांति का असली पुण्यकाल और दान-स्नान का उत्सव अगले दिन 15 जनवरी को मनाया जाएगा।
क्यों खिसक रही है तारीख? (ज्योतिष का गणित)
इसके पीछे कोई जादू नहीं, बल्कि विशुद्ध खगोलीय गणना है। ज्योतिषविदों के अनुसार, सूर्य को एक राशि से दूसरी राशि में जाने में हर साल 20 मिनट की देरी होती है। प्रतिवर्ष सूर्य के राशि परिवर्तन में 20 मिनट का विलंब होता है। इस प्रकार तीन वर्षों में यह अंतर एक घंटे का हो जाता है।
3 साल में: यह अंतर 1 घंटे का हो जाता है।
72 साल में: यह अंतर पूरे 24 घंटे यानी एक दिन का हो जाता है।
सूर्य और चंद्रमा हमेशा सीधे (मार्गीय) चलते हैं, वे कभी पीछे नहीं लौटते। इसी वजह से हर 72 साल में मकर संक्रांति की तारीख एक दिन आगे बढ़ जाती है।
इतिहास के पन्नों में संक्रांति का सफर
समय के साथ मकर संक्रांति ने अपनी तारीखें कुछ इस तरह बदली हैं:
सम्राट हर्षवर्धन काल (7वीं सदी): उस समय सूर्य का मकर राशि में प्रवेश 24 दिसंबर के आसपास होता था।
गुप्त काल: सम्राट चंद्रगुप्त के समय के आसपास (लगभग 1600-1700 साल पहले) मकर संक्रांति 21-22 दिसंबर के आसपास होती थी।
कुषाण काल या उससे पहले: ईसा पश्चात की शुरुआती सदियों में यह खिसककर 15 से 20 दिसंबर के बीच रही होगी।
मुगल बादशाह अकबर काल (16वीं सदी): इस दौरान संक्रांति 10 जनवरी को मनाई जाती थी।
छत्रपति शिवाजी महाराज (17वीं सदी) के काल में यह पर्व 11 जनवरी को पड़ता था।
1. साल 1792 से 1863 के बीच यह 12 जनवरी को मनाई जाती थी।
2. साल 1863 में स्वामी विवेकानंद का जन्म हुआ था, तब 12 जनवरी को ही मकर संक्रांति का महायोग बना था।
3. साल 1864 से 1936 तक यह 13 जनवरी को आती थी।
4. साल 1936 से 2008 तक: यह पर्व मुख्य रूप से 14 जनवरी को मनाया जाता रहा।
5. वर्तमान काल (21वीं सदी): अब हम इसे 14 या 15 जनवरी को मनाते हैं।
भविष्य में मकर संक्रांति का संयोग:
1. 2080 तक: अगले 54 वर्षों तक हम 15 जनवरी को ही खिचड़ी खाएंगे और पतंग उड़ाएंगे।
2. 2081 से: इसके बाद यह पर्व एक कदम और आगे बढ़कर 16 जनवरी को मनाया जाने लगेगा।
जब फरवरी और मार्च में आएगी संक्रांति:
सूर्य की गति: चूंकि सूर्य की गति का यह बदलाव निरंतर जारी है, इसलिए भविष्य में मकर संक्रांति की तारीखें और आगे बढ़ती जाएंगी।
वर्ष 2600: मकर संक्रांति 23 जनवरी को मनाई जाएगी।
5000 वर्ष बाद: यह पर्व जनवरी छोड़ कर फरवरी के महीने में प्रवेश कर जाएगा।
वर्ष 7015: खगोलीय गणना के अनुसार, उस समय मकर संक्रांति 23 मार्च को मनाई जाने लगेगी।
इस बार का पुण्यकाल
चूंकि सूर्य का गोचर 14 जनवरी की रात को है, इसलिए 16 घंटों का लंबा पुण्यकाल मिलेगा, जो 15 जनवरी की दोपहर तक रहेगा।