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Written By WD Feature Desk
Last Updated : गुरुवार, 8 जनवरी 2026 (17:06 IST)

Makar Sankranti Kite Flying: मकर संक्रांति पर पतंगबाजी का पर्व: एक रंगीन उत्सव, जानें इतिहास, महत्व और प्रभाव

Makar Sankranti and Kite Flying
Makar Sankranti 2026: मकर संक्रांति भारत का एक महत्वपूर्ण त्योहार है, जिसे 14 जनवरी को मनाया जाता है। मकर संक्रांति को सूर्य के मकर राशि में प्रवेश के रूप में मनाया जाता है, जो नए ऊर्जा और समृद्धि का संकेत है। पतंगबाजी इस दिन का सबसे रोमांचक और लोकप्रिय हिस्सा होती है। खासकर गुजरात, राजस्थान, दिल्ली, और उत्तर भारत के अन्य हिस्सों में, लोग पतंगबाजी का भरपूर आनंद लेते हैं। इस दिन, आसमान रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाता है, और यह दृश्य किसी जश्न से कम नहीं होता।ALSO READ: जनवरी में मकर संक्रांति के साथ पोंगल, लोहड़ी, भोगी पंडिगाई, मकरविलक्कु और माघ बिहु का महत्व
 
मकर संक्रांति और पतंगबाजी: भारत में, मकर संक्रांति के अवसर पर विशेष रूप से पतंगबाजी का आयोजन होता है। मकर संक्रांति के दिन जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है, तब उत्तरायण की शुरुआत होती है, और यह दिन सर्दी के मौसम में गर्मी की शुरुआत को भी दर्शाता है। इस दिन पतंग उड़ाना एक पारंपरिक और उत्साही गतिविधि है।

मकर संक्रांति के दिन विशेष रूप से गुड़ और तिल के लड्डू बनाए जाते हैं, और लोग इन्हें एक-दूसरे को उपहार में देते हैं। इसके साथ ही, पतंगबाजी का आयोजन भी किया जाता है, जो इस दिन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाता है। गुजरात में इसे उत्तरायण के नाम से जाना जाता है, और इस दिन को लेकर वहां  विशेष मेला और उत्सव आयोजित किए जाते हैं। यह दिन न केवल पतंगबाजी का होता है, बल्कि लोग संगीत, नृत्य और पारंपरिक कार्यक्रमों का आनंद भी लेते हैं।
 
पतंगबाजी का इतिहास और महत्व: पतंगबाजी का पर्व सबसे पहले चीन में हुआ था, और धीरे-धीरे यह उत्सव एशियाई देशों में फैलता गया। भारत में, विशेष रूप से गुजरात और पंजाब में, यह पर्व मकर संक्रांति से जुड़ा हुआ है। मकर संक्रांति के दिन सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने पर सूर्य की पूजा की जाती है, और यह दिन उत्तरायण के शुभारंभ के रूप में मनाया जाता है। इस दिन लोग सूर्योदय के साथ पतंग उड़ाने का आनंद लेते हैं और आसमान रंग-बिरंगी पतंगों से सज जाता है।
 
पतंगबाजी का यह पर्व खुशियों और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। इसे एक सामूहिक उत्सव के रूप में मनाया जाता है, जिसमें लोग एक-दूसरे के साथ मिलकर पतंग उड़ाने का आनंद लेते हैं। खासकर गुजरात में "उत्तरायण" नाम से मकर संक्रांति की खासियत होती है, जिसमें पतंगबाजी का आयोजन बेहद धूमधाम से होता है।
 
पतंगबाजी का आनंद: पतंगबाजी का पर्व न केवल एक खेल होता है, बल्कि यह सामाजिक और सांस्कृतिक समारोह बन जाता है। यह दिन पूरे परिवार और समुदाय के लिए खुशियां और एकता का समय होता है। पतंग उड़ाने के दौरान लोग एक-दूसरे के साथ मज़ेदार प्रतिस्पर्धाएं करते हैं। एक ओर जहां बड़े लोग पतंगबाजी का आनंद लेते हैं, वहीं छोटे बच्चे भी इस उत्सव में भाग लेते हैं और अपनी रंग-बिरंगी पतंगों को उड़ाते हैं।
 
इस दिन की विशेषता यह होती है कि आसमान में सैकड़ों पतंगें उड़ती हैं, और हवा में रंगों की चमक और जोश महसूस होता है। 'पतंग कटने' का खेल भी इस दिन एक बड़ा आकर्षण होता है, जहां हर व्यक्ति अपनी पतंग को दूसरों की पतंगों को काटने के लिए दौड़ाता है। यह एक प्रकार का मुकाबला होता है, जो उत्साह और प्रतिस्पर्धा को और बढ़ा देता है।
 
पतंगबाजी का सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव: पतंगबाजी का पर्व सामाजिक एकता और भाईचारे का प्रतीक है। यह केवल एक खेल नहीं होता, बल्कि यह लोगों को एक दूसरे के साथ मिलकर आनंद लेने और एकता महसूस करने का मौका देता है। इस दिन को लेकर परिवार और दोस्तों के बीच खुशी और मेल-मिलाप की भावना बढ़ती है।
 
पतंगबाजी का यह उत्सव बच्चों के लिए विशेष रूप से रोमांचक होता है, क्योंकि वे अपनी पतंगों के साथ खेलते हैं और नए रंग-बिरंगे पतंगों की तलाश में रहते हैं। साथ ही, यह दिन पुराने झगड़ों को भूलकर एक दूसरे के साथ खुशी बांटने का दिन भी होता है।
 
रोमांचक खेल और उत्सव: भारत में कई तरह के उत्सव और पर्व मनाए जाते हैं, जो अपनी विविधता और सांस्कृतिक धरोहर के लिए प्रसिद्ध हैं। इन पर्वों में से एक है पतंगबाजी का पर्व, जो खासतौर पर मकर संक्रांति के अवसर पर मनाया जाता है।

पतंगबाजी न केवल भारत में, बल्कि दुनियाभर में एक रोमांचक खेल और उत्सव के रूप में मनाई जाती है। यह पर्व खासतौर पर उत्तर भारत, महाराष्ट्र, गुजरात और पंजाब में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। पतंगबाजी का पर्व सर्दी के मौसम में खुशी, उमंग और उत्साह का प्रतीक होता है।ALSO READ: Makar Sankranti 2026: मकर संक्रांति पर किस देवता की होती है पूजा?
 
पतंगबाजी का पर्यावरण पर प्रभाव: हालांकि पतंगबाजी का पर्व खुशी और उत्साह का प्रतीक है, लेकिन इसके साथ पर्यावरणीय समस्याएं भी जुड़ी हुई हैं। विशेष रूप से पतंग की डोर या मांझा के कारण पक्षियों के चोटिल होने और पर्यावरण को नुकसान पहुंचने की समस्याएं आती हैं। इसके अलावा, पतंगों का अवशेष भी पर्यावरण में फैलता है, जो प्रकृति के लिए हानिकारक हो सकता है। इसलिए कई स्थानों पर इस समस्या को हल करने के लिए साफ-सफाई और ईको-फ्रेंडली पतंगों का प्रयोग करने के लिए जागरूकता बढ़ाई जा रही है।
 
पतंगबाजी का पर्व केवल एक खेल या मनोरंजन का दिन नहीं होता, बल्कि यह समाज में खुशियां फैलाने, एकता का प्रतीक और सांस्कृतिक धरोहर को संजोने का दिन है। मकर संक्रांति के दिन पतंग उड़ाना एक परंपरा बन गई है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी निभाई जाती है।

इस दिन का महत्व न केवल धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से है, बल्कि यह लोगों के बीच भाईचारे और मित्रता को भी बढ़ावा देता है। हमें इस दिन का आनंद तो लेना चाहिए, लेकिन हमें पर्यावरण का ध्यान रखते हुए इसे सुरक्षित और ईको-फ्रेंडली तरीके से मनाना चाहिए।
 
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