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मैं भी उठूँ, तुम भी उठो...

मशहूर शायद कैफी आजमी
आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है, आज की रात ना फुटपाथ पे नींद आएगी, सब उठो, मैं भी उठूँ, तुम भी उठो, कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जाएगी।

मशहूर शायद कैफी आजमी ने तीन दशक पहले ये पंक्तियाँ लिखी थीं और तब उन्हें शायद ही पता हो कि उनके पैतृक जिले आजमगढ़ का नाम गलत वजहों से लिया जाएगा और उसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील उत्तरप्रदेश की आतंक की फैक्टरी तक करार दिया जाएगा।

अभी तक शिक्षा और साहित्य के लिए मशहूर आजमगढ़ जिले को अचानक आतंकवाद से जोड़ दिए जाने से वहाँ के लोग काफी आहत हैं। दिल्ली के बटला हाउस एनकाउंटर में मारे गए तथा पकड़े गए युवकों के आजमगढ़ से तार जुड़े होने की बात सामने आने पर यह जिला पहली बार गलत वजहों के लिए सुर्खियों में आया।

अब लोकसभा चुनाव में आजमगढ़ फिर चर्चा में है। राजनीतिक दल इस सीट पर भारी दाँव लगाए बैठे हैं। नवगठित उलेमा काउंसिल जो आतंक के नाम पर स्थानीय युवकों के उत्पीड़न के खिलाफ लड़ रही है, ने भी अपना उम्मीदवार यहाँ से उतारा है।

काउंसिल आजमगढ़ से दिल्ली के लिए उलेमा एक्सप्रेस चलाकर चर्चा में आई थी। बाद में लखनऊ के लिए भी ऐसी ही विशेष ट्रेन चलाई गई और मुस्लिम युवकों को आतंकी करार दिए जाने के खिलाफ प्रदर्शन किया गया। काउंसिल ने अब्दुल्ला अख्तर के पिता जावेद अख्तर को यहाँ से चुनाव मैदान में उतारा है। अब्दुल्ला अख्तर दिल्ली में हुए श्रृंखलाबद्ध विस्फोटों के मामले में अभियुक्त हैं।

काउंसिल के संयोजक आमिर रशदी मदनी ने बताया कि हम सीट जीत रहे हैं क्योंकि यहाँ मुस्लिमों को आतंकवाद के नाम पर निशाना बनाया जा रहा है। सत्ताधारी बसपा के उम्मीदवार अकबर अहमद डंपी यहाँ फिर से किस्मत आजमा रहे हैं। वह फिलहाल यहाँ के वर्तमान सांसद हैं। मैदान में मुख्य विपक्षी दल सपा भी है, जो 2004 के चुनाव और 2008 में हुए उपचुनाव में मिली हार का बदला लेने के लिए बेताब है।

भाजपा ने रमाकांत यादव को टिकट दिया है जिनका क्षेत्र के लोगों पर खासा दबदबा माना जाता है। यादव ने इस सीट का 1996 से 2004 तक संसद में प्रतिनिधित्व किया। दिलचस्प बात यह है कि भाजपा में जाने से पहले यादव सपा और बसपा में भी रह चुके हैं।

महापंडित राहुल सांस्कृत्यायन, अल्लामा शिबली नोमानी, जावेद अख्तर और उनके पिता मशहूर शायर जाँनिसार अख्तर, खलीलुर्रहमान आजमी, अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध तथा मौलाना वहीदुद्दीन खान की धरती पर साक्षरता दर केवल 43 प्रतिशत है। एक स्थानीय पार्षद के मुताबिक यहाँ करीब 57 प्रतिशत महिला आबादी निरक्षर है। जिले में केवल एक मेडिकल कॉलेज है, लेकिन मौजूदा चुनाव में विकास कोई मुद्दा नहीं है। यह केवल दिग्गजों की जंग बनकर रह गया है।

उलेमा काउंसिल बाटला हाउस मुठभेड़ को लेकर मुस्लिम भावनाएँ अपने पक्ष में करने की कोशिश में है, जबकि सपा के उम्मीदवार दुर्गा यादव यहाँ के यादव समुदाय के वोट पर भरोसा कर रहे हैं। आजमगढ़ के वर्तमान विधायक यादव के मुताबिक यहाँ के कुल मतदाताओं में से 50 फीसदी यादव हैं।

आजमगढ़ की चुनावी लड़ाई में अधिकांश दल मुस्लिम वोट बैंक पक्का करने की कोशिश में लगे हैं। ऐसे में हिन्दू वोट यहाँ निर्णायक साबित हो सकता है। 1952 से अब तक यहाँ से हिन्दू उम्मीदवार 13 बार चुनाव जीते हैं, जबकि केवल दो बार ही 1978 और 2008 में मुस्लिम उम्मीदवारों ने जीत का स्वाद चखा है।

कांग्रेस की वरिष्ठ नेता मोहसिना किदवई 1978 में इस सीट पर जीती थीं जबकि तीन दशक बाद अकबर अहमद डंपी 2008 के उपचुनाव में यहाँ से विजयी हुए थे।

आतंकी हमलों में आजमगढ़ के युवकों के शामिल होने को लेकर कितना भी हो हल्ला हो रहा हो लेकिन तथ्य यह है कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में शुरू से ही किसी जिले से सबसे अधिक छात्र यदि पढ़ने आते हैं तो वह आजमगढ़ है।

स्वतंत्रता की पहली लड़ाई से लेकर अभी तक प्रगतिशील आंदोलन में अग्रणी माने जाने वाले आजमगढ़ के लोगों को अपनी इस विरासत पर गर्व है और शायद इसीलिए आजमगढ़ के अधिकांश लोग अपने नाम के आगे आजमी लगाते हैं।
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