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Written By राजश्री कासलीवाल

माँ, कहाँ हो तुम?

जीवन के रंगमंच से...

मातृ दिवस
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21 साल बीत गए मैंने माँ का चेहरा नहीं देखा। माँ का चेहरा अब जैसे मेरी आँखों के आगे धुँधला-सा हो गया है। ठीक से याद भी नहीं आता कि कैसा था उनका चेहरा। अपने जीवन इन वर्षों में माँ से दूर हुए एक लंबा युग बीत गया है। फिर भी हर पल उनकी याद को अपने अंदर महसूस करती रहती हूँ।

एक सीधी-सादी माँ। बिलकुल गाय-सी सीधी। कभी किसी को कुछ न बोलने वाली। बल्कि यह कि जो भी कुछ कहें बस सुनती जाएँ। पर आज के इस हाईटेक जमाने में ऐसी माँ कम ही देखने को मिलती है। अब तो मैं माँ शब्द की गरिमा भी ठीक से नहीं बता सकती। जबकि मैं खुद नानी हो गई हूँ। लेकिन माँ का असली अर्थ तो शायद समझ में नह‍ीं आ पाया।

हमेशा एक बात दिल को चुभती रहती है कि काश अगर आज माँ और पिताजी होते तो शायद मेरा जीवन कुछ और ही हो‍ता लेकिन क्या करें, वैसे भी इंसान के हाथ में कुछ नहीं होता है। सबकुछ तो परमात्मा के हाथ में ही हैं और हम तो जीवन की वो कठपुतली है जिसे भगवान जैसे चाहे वैसे अपनी ऊँगलियों पर नचाते रहते हैं।

अगर सब कुछ हमारे हाथ में होता तो शायद आज किसी को ‍भी किसी के बिछड़ने का गम नहीं होता। माता-पिता, भाई-बंधु सबकुछ हमारे पास ही होते। हमारे आसपास और उन सबकी नोंक-झोंक और लाड़-प्यार में हम अपने जीवन को जी रहे होते। लेकिन यह सब संभव नहीं है। माँ भी किसी की बेटी होगी। उस बेटी का जन्म काम करने से शुरू होता है और खत्म भी काम होने पर ही होता है। लेकिन याद रह जाती है सिर्बातें। कुछ बातें।

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जब मामला ताजा हो तो याद रखने की दिमाग की ताकत भी उतनी ही शक्तिशाली होती है। लेकिन बीतते समय के साथ, बढ़ती उम्र के साथ बातें धुँधली हो जाती है। दृष्‍टि-पटल पर एक ऐसा छायाचित्र ठहर जाता है वो बस कुछ-कुछ याद रहता है कुछ-कुछ नहीं।

ऐसा नहीं है कि हम सिर्फ माँ को एक ही दिन याद करते हैं। सच्ची बात तो यह है कि माँ को हर पल, हर वो समय जो कहीं भी बैठे आप गुजार रहे हो माँ की याद आ ही जाती है। उसका वो हमेशा हँसता-मुस्कुराता चेहरा आँखों के सामने से आकर चला जाता है। और हम चाहकर भी उसको थाम नहीं सकते। कुछ समय के लिए उसको पकड़ कर अपने पास नहीं रख सकते और ना ही उनसे बात करके अपना जी हल्का कर सकते हैं।

ऐसी माँ का वो सच्चा साथ जब जीवन से छूट जाता है तो फिर दोबारा नहीं मिल पाता। माँ की उस चाहत को आप सिर्फ दिल में ही कैद करके रख सकते है। चाह कर भी उस जन्मदायिनी को आप वापस दोबारा नहीं पा सकते। ऐसे में माँ की वो यादें अतीत के बिखरे पन्नों की तरह आपके जीवन में रह जाती है। कई बार सोचती हूँ कि काश! ऐसा हो कि कुछ समय के लिए मैं माँ से बात कर पाऊँ।

जानती तो मैं भी हूँ इस बात को किसी ऐसा कभी नहीं हो सकता लेकिन फिर भी मन है जो कुछ भी सोचता रहता है। ऐसे मन का क्या करें जिसे माँ की बहुत याद आती है लेकिन आपके सामने कोई विकल्प ही नहीं है ऐसे समय क्या करें? सच में बहुत ही मुश्‍किल है जीवन के सच्चाई का असली सफर जिसमें छूट गए अपनों से फिर मिल पाना संभव नहीं।

कई बार तो मन ऐसा छटपटाता है और लगता है खूब जोर से चिल्लाऊँ, माँ को पुकारूँ और कहूँ- माँ! कहाँ हो तुम...????
लेखक के बारे में
राजश्री कासलीवाल
Writing in Hindi on various topics, including life style, religion, and astrology.... और पढ़ें