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Written By WD

बादल आए, बचपन लाए

जीवन के रंगमंच से

बादल आए
मीनू जैन
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उमड़-घुमड़ के जो बादल घिरा अटारी पर,
विहंग बन के उड़ी इक उमंग फिर यारों।
बंद कमरे की खुली खिड़की से आसमाँ में घटा को घिरते देख मन में उमंग की हिलोर उठने लगती है और लौटा ले आती है 'पानी बाबा आव जो, ककड़ी भुट्टा लावजो' के शोर में डूबे बचपन को। मेघों से अमृत बूँदों का छलकना हम बच्चों के चेहरे पर नूर ला देता था। हल्की-फुल्की फुहारें हो या मूसलधार बारिश हमारी तो बस भींगने की तैयारी शुरू हो जाती।

किसी भी बहाने थोड़ा गीला हो जाना और फिर गीले तो हो ही गए हैं तो बारिश में नहा ही लेते हैं। एक -दूसरे को पकड़-पकड़कर भिगोना और बड़ों की डाँट पड़ने पर, 'मैं तो नहीं जा रही थी, इसने पकड़कर भिगो दिया' का मासूम-सा बहाना। दिन में कम से कम दो बार कपड़ों को तरबतर कर माँ की परेशानी बढ़ाना (वर्षा में बिना वाशिंग मशीन के जमाने में कपड़े सुखाना कठिन कार्य होता था)।

बारिश की छमाछम पड़ती बूँदों के साथ मन में भगवान से यही प्रार्थना उठती थी कि स्कूल जाने के समय तक तेज बारिश होती रहे, ताकि पापा का लाड़, मम्मी की डाँट पर भारी पड़े और स्कूल की छुट्टी मारने को मिल जाए। पापा कह देते- ऐसी बारिश में क्या स्कूल
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भेजना? कोई पढ़ाई-वढ़ाई नहीं होगी आज। चलो घर में बैठकर पढ़ो। बस हो गई छुट्टी और मजे ही मजे।


वर्षा की फुहारों के हल्के होते ही घर के आसपास के कंपाउंड में धुले मोती समान रंगीन पत्थर, शंख और सीपियाँ चुनना पसंदीदा खेल बन जाता। फ्रॉक या नेकर की जेबों में यह खजाना इकट्ठा किया जाता। बगीचे में फूलों के पीछे उड़ती रंग-बिरंगी तितलियों को भाग-भागकर पकड़ना। कभी समाचार-पत्र तो कभी जल्दबाजी में कॉपियों के पन्ने फाड़-फाड़कर बनाई कश्तियों की दौड़। किसकी नौका बिना डुबे सबसे आगे निकलती है, का कॉम्पिटिशन होता। कभी-कभी इस दौड़-भाग में मिट्टी में दबे पाँच-दस पैसों का सिक्का मिल जाना, किसी कारू के खजाने के मिलने से कम नहीं होता था।

पैरों के पंजों को रखकर उस पर मिट्टी के घरौंदे बनाना और उस पर टूटी चूड़ियों, सीपियों और कनेर के फूलों से डेकोरेशन करना और दूर से हर एंगल से निहारना। उस खूबसूरत घरौंदे की उम्र थोड़ी ही होती थी, क्योंकि संग खेलते छोटे भाई-बहनों या दोस्तों में कुछ न कुछ तकरार हो ही जाती और निशाने पर होते बने घरौंदे। इस बात पर थोड़ी देर घमासान होता और युद्धविराम के पश्चात नया खेल शुरू, जिसमें मेंढक के टर्राने की आवाज निकालने की होड़ होती या फिर वैसे ही उछल-उछलकर चलने की।

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एड़ी मिट्टी में धँसाकर पाँव के अँगूठे से गोल-गोल घेरे बनाने का अलग ही मजा था। गीली मिट्टी से कपड़ों और चेहरे का मेकअप तो अपने आप हो जाता था। ऐसे में कपड़े ज्यादा गंदे होने का भय नहीं रहता था और तब परिजनों का 'डस्ट' में मत खेलना 'जर्म्स' होते हैं, जैसे हुक्म भी नहीं होते थे। तब वो बड़े लोगों का 'थोड़ी देर खेल लेने दो, कुछ नहीं होगा' का आश्वासन साथ रहता था।

पानी के डबरों में छपाक-छई खेलते हुए चेहरे पर उन्मुक्त हँसी होती थी। इस मौसम में ढेर से कीट-पतंगें जमीन पर तो कुछ पौधों पर चलते, उड़ते मिल जाते। किसी का शरीर सुनहरा होता तो किसी की आँखें मोती की तरह रंग-बिरंगी चमकदार। प्रकृति की इस अनोखी करामात पर उस समय मन में ढेरों सवाल उठते रहते। हमारी आँखें ऐसी क्यों नहीं हैं? हम क्यों नहीं मनचाहा रंग बदल सकते?

कभी बड़ों की देखा-देखी छोटे-छोटे पौधे उगाने की कोशिश होती तो कभी मिट्टी में दबा-दबाकर चने या मूँगफली बोने का प्रयास। दानों में से अंकुर का फूटना बहुत बड़ी कामयाबी होती, जिसका जश्न घर के हर छोटे-बड़े सदस्य को बुला-बुलाकर दिखाया जाना होता- 'देखो, मैंने उगाया है, मेरा पौधा बड़ा होगा।' आसपास के नदी-नाले पूर पर आते ही देखने जाने की होड़ और फिर लौटते वक्त वहाँ से मछलियाँ घर लाने और पालने का हठ।

बरसते पानी में घर के बड़े लोगों की फरमाइश पर रसोई से आती पकौड़ों की खुशबू वर्षा के आनंद को दुगुना कर देती थी। हर एक की पसंद का ध्यान रखकर हर तरह- आलू, प्याज, पालक, गिलकी तो आम और केले के भी भजिए बनते हैं। साथ में गुड़ के मीठे गुलगुले, वे हम बच्चों के लिए बनते ही। नाम बच्चों का होता, मगर खाते सभी बड़े भी शौक से। गर्मागर्म भजियों की रेलमपेल में बाहर वर्षा की बूँदों और रसोई में माँ के माथे से टपकती पसीने की बूँदें मानो एक-दूसरे को टक्कर देतीं, क्योंकि भजियों का आनंद सिर्फ संयुक्त परिवार के लोगों ही नहीं, अड़ोसी-पड़ोसी सभी के साथ मिलकर लिया जाता था।

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इसी के साथ ही खेत पर जाकर दाल-बाटी खाने का प्रोग्राम भी फिक्स कर लिया जाता था। बैलगाड़ी, छकड़ों और फिर ट्रैक्टर ट्रॉली में बैठकर जाने का अनुभव ही अद्वितीय होता। इस सबके दौरान बच्चों में बड़ों के साथ सहयोग करने की भावना भी प्रबल रहती। उत्साह के साथ हर कार्य में भागीदार होने का प्रयास रहता, जिससे हर बात में एक नई सीख मिलती जाती।

वर्षा से बचने के लिए बड़ों के पास बड़े-बड़े काले छाते होते तो बच्चों के लिए तो टाट के बोरे ही काफी होते। बादलों की गड़गड़ाहट मुझे पुनः अतीत से निकालकर यथार्थ में ला रही है। बूँदें गर्मी की तपन और घमौरियों की जलन को शांत करने के लिए बरसना शुरू हो गई है तो चलिए बच्चों को बुलाइए और बालकनी या छत जहाँ भी जगह मिले, रेन डांस करते हुए जमकर भीगिए और अपने बचपन को फिर से जी भरकर जी लीजिए।
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