आशुतोष पाण्डेय अनुवाद: शिवांगी सक्सेना
अमेरिका और इजराइल के ईरान पर हमले और उसके जवाब में ईरान की आक्रामक प्रतिक्रिया ने वैश्विक तेल बाजार को अस्थिर कर दिया है। विश्लेषकों को आशंका है कि इससे कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है। ईरान वैश्विक तेल उत्पादन में तीन से चार प्रतिशत योगदान करता है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से ईरान की निकटता भौगोलिक दृष्टि से महत्तवपूर्ण है। यह दुनिया का सबसे जरुरी तेल मार्ग है।
विश्व के कुल तेल उत्पादन का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से ही गुजरता है। अगर यहां लंबे समय के लिए यातायात बाधित हो जाए, तो तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल को भी पार कर सकती हैं। यह संभावना वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए चुनौतीपूर्ण होगी। यह पहले से ही नियंत्रित करना मुश्किल हो रही कीमतों को और बढ़ा सकती है।
तेल खरीद-बिक्री करने वाले व्यापारियों का पूरा ध्यान इस समय स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर है, जहां व्यावसायिक जहाजों का यातायात लगभग ठप हो गया है। सोमवार (दो मार्च) को ब्रेंट क्रूड तेल की कीमतें अचानक 13 प्रतिशत तक बढ़ गई। यह अमेरिका और इजराइल के हमलों के बाद पहला ट्रेडिंग दिन था। बाद में कीमतें कुछ घटकर लगभग 77 डॉलर प्रति बैरल पर आ गई।
तेल की कीमतें पहले ही पिछले कई महीनों में उच्च स्तर पर हैं। व्यापारी ईरान पर संभावित सैन्य हमलों के असर को लेकर चिंतित हैं। इस स्थिति को संभालने के लिए तेल उत्पादक देशों के समूह ओपेक (ओपीईसी प्लस) ने रविवार को अप्रैल से तेल का उत्पादन बढ़ाने का फैसला लिया।
कैपिटल इकॉनोमिक्स में चीफ इमर्जिंग मार्केट्स अर्थशास्त्री विलियम जैक्सन का कहना है, "यदि यह संघर्ष लंबा चलता है और ईरान की आपूर्ति में रुकावट या स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को ब्लॉक करने की कोशिश जैसी स्थिति आती है, ऐसे में तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल तक बढ़ सकती हैं।"
ईरान कितना तेल उत्पादन करता है?
ईरान ओपेक देशों में चौथा सबसे बड़ा तेल उत्पादक है। देश हर दिन लगभग 33 लाख बैरल तेल (बीपीडी) का उत्पादन करता है। ईरान दुनिया के सबसे बड़े प्राकृतिक गैस उत्पादकों में भी शुमार है।
देश में दुनिया के विशाल तेल भंडार भी मौजूद हैं। अमेरिका की ऊर्जा सूचना प्रशासन (ईआइए) के अनुसार, ईरान के पास मध्य पूर्व के तेल भंडार का लगभग एक चौथाई और दुनिया के कुल तेल भंडार का 12 प्रतिशत हिस्सा है। सालों तक निवेश की कमी और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों की वजह से ईरान का उत्पादन सीमित रहा है।
मगर ईरान ने पश्चिमी प्रतिबंधों को मात देने के तरीके खोज लिए। वह अपने निर्यात किए गए तेल का 90 प्रतिशत चीन को बेचता है। चीन की मांग के कारण ही ईरान ने साल 2020 से 2023 के बीच अपनी कच्चे तेल की उत्पादन क्षमता लगभग दस लाख बैरल प्रति दिन (बीपीडी) बढ़ा दी।
ईरान की अर्थव्यवस्था कई अन्य मध्य पूर्वी तेल-निर्भर देशों की तुलना में काफी अलग है। फिर भी ऊर्जा निर्यात सरकार के राजस्व का एक अहम हिस्सा है। ईआइए के आंकड़ों के मुताबिक साल 2023 में ईरान की तेल कंपनियों ने तेल निर्यात से लगभग 53 बिलियन डॉलर कमाई की।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर ध्यान क्यों केंद्रित है?
यह विश्व का प्रमुख तेल परिवहन मार्ग है, जो पर्शियन गल्फ को गुल्फ ऑफ ओमान और अरब सागर से जोड़ता है। होर्मुज ईरान और ओमान के बीच स्थित है। इस मार्ग से क्षेत्र के देशों जैसे सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत और इराक द्वारा उत्पादित भारी मात्रा में कच्चा तेल दुनिया भर में जाता है। ईरान कई बार इस मार्ग को अवरुद्ध करने की धमकी देता रहा है। लेकिन कभी इसे वास्तविक रूप से बंद नहीं किया। ऐसा करने से उसे अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया का सामना करना पड़ेगा और उसका खुद का तेल निर्यात प्रभावित हो सकता है।
जारी युद्ध के बीच स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में यातायात लगभग ठहर गया है। कई तेल परिवाहक और व्यापारी सुरक्षा संबंधी चिंताओं और अधिकारियों की चेतावनियों के चलते इस जलमार्ग से अपने परिवहन को गुजरने से रोक चुके हैं।
इसके कारण 150 लाख बैरल प्रतिदिन (बीपीडी) कच्चा तेल बाजारों तक पहुंचने से रोकने की स्थिति पैदा हो जाती है। यह वैश्विक समुद्री तेल व्यापार का लगभग 30 प्रतिशत है। रिस्टाड एनर्जी के अनुसार भले ही स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बायपास करने के लिए वैकल्पिक रास्ते का इस्तेमाल किया जाए, तब भी 80 से सौ लाख बैरल प्रतिदिन तेल की आपूर्ति कम हो जाएगी।
रिस्टाड एनर्जी के वरिष्ठ उपाध्यक्ष और भू-राजनीतिक विश्लेषण प्रमुख जॉर्ज लेऑन कहते हैं, "चाहे स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बल के प्रयोग से बंद कर दें या यह असुरक्षित बन जाए, तेल के प्रवाह पर असर लगभग एक जैसा ही होगा। यदि जल्द ही युद्ध शांत करने के संकेत नहीं आते हैं, तो हम उम्मीद करते हैं कि सप्ताह की शुरुआत में तेल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी।"
ओपेक देशों ने क्या प्रतिक्रिया दी?
ओपेक (प्लस) सऊदी अरब के नेतृत्व वाले पेट्रोलियम निर्यातक देशों का गठबंधन है। रूस समेत कुछ अन्य तेल उत्पादक देश भी इसमें शामिल हैं। इस समूह ने रविवार को हर देश के तय किए गए तेल उत्पादन में उम्मीद से ज्यादा बढ़ोतरी करने की घोषणा की है।
जॉर्ज लेऑन बताते हैं, "समूह ने उत्पादन को बढ़ाया, लेकिन ज्यादा बढ़ोतरी नहीं की। इसका मतलब है कि वे वर्तमान में भू-राजनीतिक खतरे और साल के अंत में तेल ज्यादा होने के जोखिम के बीच संतुलन बनाए रखना चाहते हैं। अगर खाड़ी के रास्ते से तेल का प्रवाह रुकता है, तो अतिरिक्त उत्पादन केवल थोड़ी राहत दे सकता है। इसलिए तेल के निर्यात के रास्तों तक पहुंच हासिल करना उत्पादन बढ़ाने से ज्यादा जरूरी हो जाता है।"
हाल के हफ्तों में सऊदी अरब ने अपने कच्चे तेल के निर्यात को बढ़ा दिया है। विश्लेषकों ने इसे अमेरिका और इजराइल हमलों से पहले अस्थायी सुरक्षा (बफर) बनाने की कोशिश के तौर पर माना है। ब्लूमबर्ग के डाटा की मानें तो सऊदी अरब ने फरवरी के पहले 24 दिनों में लगभग 73 लाख बैरल प्रतिदिन (बीपीडी) तेल निर्यात किया। यह अप्रैल 2023 के बाद सबसे अधिक है। सऊदी अरब ने पिछले साल जून में भी तेल निर्यात बढ़ाया था। ठीक उसी समय जब अमेरिका ने ईरानी परमाणु ठिकानों पर हमला किया था।
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान ने भी अमेरिका के साथ बातचीत शुरू होने से पहले अपने तेल निर्यात को बढ़ाया था। जॉर्ज लेऑन आगे कहते हैं, "ये अस्थायी सुरक्षा उपाय या बफर सीमित समय के लिए ही उपयोगी होते हैं। इनका मकसद केवल अस्थायी संकट के प्रभाव को कम करना है। इससे लंबे समय तक चलने वाली गंभीर समस्याएं पूरी तरह हल नहीं होंगी।"
ऊंची तेल कीमतें वैश्विक अर्थव्यवस्था को कैसे प्रभावित करेंगी?
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर इस बात पर काफी निर्भर करेगा कि तेल की कीमतें अब कितनी बढ़ती हैं। कच्चा तेल एक मुख्य आर्थिक वस्तु है। इसलिए तेल की कीमतें बढ़ने से अन्य सामानों और सेवाओं की कीमतों में भी वृद्धि होगी।
विलियम जैक्सन बताते हैं कि सामान्य तौर पर अगर तेल की कीमतें साल-दर-साल पांच प्रतिशत बढ़ती हैं, तो इससे मुख्य अर्थव्यवस्थाओं में औसत महंगाई दर में लगभग 0.1 प्रतिशत बढ़ोतरी होती है। उन्होंने बताया, "यदि ब्रेंट क्रूड की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल हो जाती है, इससे वैश्विक महंगाई दर में 0.6 से 0.7 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हो सकती है।"
महंगाई बढ़ने से उपभोक्ताओं का भरोसा और खर्च कम हो जाएगा। इसके अलावा केंद्रीय बैंक महंगाई को नियंत्रण में रखने के लिए ब्याज दरें बढाएंगे, जिससे अर्थव्यवस्था की विकास दर धीमी हो सकती है।