मरने के बाद क्यों सबके अपने हो गए रामविलास पासवान

DW| Last Updated: मंगलवार, 12 अक्टूबर 2021 (08:47 IST)
रिपोर्ट : मनीष कुमार, पटना

केंद्रीय मंत्री रहे दिवंगत दलित नेता खूब चर्चा में हैं। ऐसा क्या हुआ कि सभी पार्टियां उनको अपना बता रही हैं? उन्हें भारतरत्न दिए जाने की मांग भी उठ गई है। के राजनीतिक गलियारे में आजकल फिर लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) चर्चा में है और सामने है बिहार विधानसभा की दो सीटों, तारापुर व कुशेश्वर स्थान में होने वाला उपचुनाव। जाहिर है, बात दलित वोटों की है इसलिए पार्टियों का सक्रिय व सजग होना लाजिमी है।

एलजेपी के संस्थापक व पूर्व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान की मौत के बाद बिहार विधानसभा चुनाव के समय उनके पुत्र द्वारा मुख्यमंत्री पर निशाना साधने तथा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का घटक दल होने के बावजूद एकला चलो की रणनीति पर अमल करते हुए कई सीटों पर जनता दल यूनाइटेड की हार का सबब बनने से एलजेपी चर्चा में थी।
इसके बाद यह पार्टी चर्चा में तब आई जब रामविलास पासवान की राजनीतिक विरासत का असली वारिस घोषित करने की होड़ में पार्टी टूट गई। एक गुट के मुखिया बने उनके भाई पशुपति पारस तो दूसरे गुट के प्रमुख बने उनके बेटे चिराग पासवान। दोनों में यह साबित करने की होड़ मच गई कि असली वारिस वे ही हैं।

मामला निर्वाचन आयोग में गया। दोनों को नया नाम व चुनाव चिन्ह दिया गया है। पुत्र होने के नाते चिराग का दावा तो है ही, लेकिन पशुपति पारस भी कहते रहे हैं कि मैं ही रामविलास पासवान की राजनीतिक विरासत का असली उत्तराधिकारी हूं, चिराग तो अपने पिता की संपत्ति के उत्तराधिकारी हैं।
दिल्ली में राहुल गांधी, पटना में नीतीश कुमार

बीते 8 अक्टूबर को रामविलास पासवान की पहली पुण्यतिथि मनाई गई। भाई पशुपति पारस ने इस मौके पर पटना स्थित प्रदेश कार्यालय में कार्यक्रम का आयोजन किया तो बेटे चिराग पासवान ने दिल्ली स्थित सरकारी आवास 12 जनपथ में। दोनों के बीच शक्ति प्रदर्शन की ऐसी होड़ थी कि दोनों ने ही बड़े नेताओं को आमंत्रित किया था।

दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में अन्य नेताओं के अलावा कांग्रेस नेता राहुल गांधी, केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह तथा राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के अध्यक्ष लालू प्रसाद अपनी पत्नी राबड़ी देवी के साथ पहुंचे। सभी ने पासवान के तैल चित्र पर माल्यार्पण कर उन्हें श्रद्धांजलि दी। इसके बाद चिराग ने इसे लेकर ट्वीट भी किया।
रामविलास पासवान को मौसम विज्ञानी की संज्ञा देने वाले लालू प्रसाद ने उनकी पहली पुण्यतिथि पर उन्हें भारतरत्न देने की मांग कर दी। दरअसल, इसी बहाने वे बीजेपी व जदयू को पर्दे के बाहर लाने की जुगत में हैं। वहीं पटना में आयोजित कार्यक्रम में उनके भाई व केंद्रीय मंत्री पशुपति कुमार पारस के निमंत्रण पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, शिक्षा मंत्री विजय कुमार चौधरी पहुंचे। उन्होंने पासवान के साथ छात्र जीवन के अपने संबंधों की चर्चा भी की।
इससे पहले हिंदू कैलेंडर के हिसाब से बीते 12 सितंबर को केंद्रीय मंत्री पासवान की पहली बरसी पटना में मनाई गई थी। इस आयोजन से नीतीश कुमार समेत जदयू नेताओं ने दूरी बना ली थी जबकि बड़ी संख्या में भाजपा नेता शामिल हुए थे। इसकी वजह थे आयोजनकर्ता चिराग पासवान। हालांकि, एलजेपी में टूट के बावजूद चिराग ने चाचा पशुपति पारस को आमंत्रित किया था और वह इसमें शामिल भी हुए।

क्यों जरूरी हैं रामविलास?
दरअसल, एलजेपी के संस्थापक व पूर्व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान बिहार में दलितों के एकछत्र नेता थे। 1971 में जब इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया था, तभी से दलित वोटरों को लुभाने की राजनीति शुरू हुई थी। इसके बाद के दौर में पासवान ने दलितों तथा अन्य जातियों को लेकर राजनीति की।

इस दरम्यान भोला पासवान शास्त्री और रामसुंदर दास की लोकप्रियता में कमी आई और रामविलास पासवान बिहार में दलितों के नायक बनकर उभरे। बिहार के खगडिय़ा जिले के शहरबन्नी गांव में जन्मे रामविलास पासवान पुलिस की नौकरी छोडकर राजनीति में आए थे।
वह पहली बार 1969 में कांग्रेस विरोधी मोर्चा, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी की ओर से खगड़िया की अलौली (सुरक्षित) विधानसभा सीट से विधायक बने तथा 1977 में पहली बार सांसद बने। इसी साल देश की जनता इनके नाम से परिचित हुई। वजह थी रिकार्ड मतों से हुई जीत। इसके बाद अगले 4 दशक तक वह राष्ट्रीय राजनीति में छाए रहे। केवल 1984 तथा 2009 में उन्हें पराजय का मुंह देखना पड़ा था।

1996 में पहली बार पासवान जनता दल की सरकार में केंद्र में मंत्री बने। वह ऐसे इकलौते राजनेता हैं जो 6 प्रधानमंत्रियों यथा वीपी सिंह, एचडी देवगौड़ा, इंद्र कुमार गुजराल, अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह तथा नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल में केंद्रीय मंत्री रहे। हर सरकार में चाहे वह जनता दल की सरकार रही हो या कांग्रेस की अगुआई वाली यूपीए गठबंधन की या फिर भाजपा नीत एनडीए की, सभी में उन्होंने अपनी जगह बनाई।
पासवान ने श्रम, खदान, रसायन व उर्वरक, रेलवे, संचार तथा खाद्य व उपभोक्ता मामलों जैसे विभिन्न मंत्रालयों को संभाला। उनके इसी कौशल पर तंज कसते हुए कभी उनके साथी रहे और फिर विरोधी बन गए लालू प्रसाद यादव ने उन्हें राजनीति का मौसम विज्ञानी कहा था। लंबे समय तक अपने वोट बैंक को साथ जोड़े रखने के संदर्भ में राजनीतिक प्रेक्षक कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि उन्होंने दलितों को लेकर कभी कोई बड़ा आंदोलन किया। किंतु उन्होंने उस समय खुलकर आवाज उठाई जब दलितों के अधिकार पर किसी तरह का खतरा मंडराने का अंदेशा हुआ हो।
करीब 50 साल से अधिक समय तक विधायक व सांसद रहे पासवान का राज्य के दलितों खासकर दुसाध (पासवान) और मुसलमानों में खासा आधार था जो अंत समय तक उनके साथ बना रहा। पासवान वोट का ध्रुवीकरण उनकी सबसे बड़ी ताकत बन गई थी। पत्रकार अनूप श्रीवास्तव कहते हैं कि जिस राजनेता के पास 6 फीसद से ज्यादा वोट रहेगा, उसे कौन पार्टी दरकिनार करने का हिम्मत करेगी! रामविलास पासवान की लंबी पारी का कारण उनका एकमुश्त वोट बैंक व जनता के प्रति सह्दय व्यवहार ही रहा। उनसे कोई नाराज नहीं रहा, इसलिए दलित के अलावा सवर्ण व पिछड़ों का साथ भी उन्हें मिलता रहा।
वैशाली जिले के महनार निवासी शिक्षाविद अरुण सिंह कहते हैं कि रेल मंत्री रहते हुए उनके काम को याद कीजिए। हाजीपुर में उन्होंने रेलवे का क्षेत्रीय मुख्यालय बनवा दिया। जनता के हित में खासकर अपने इलाके के लोगों के लिए वे हमेशा आगे बढ़कर काम करवाने में विश्वास रखते थे।

पासवान के वोट बैंक पर सबकी नजर

जाहिर है, रामविलास पासवान को अपना बताने वाले सभी दलों की नजर दरअसल बिहार के 6 फीसद पासवान वोटरों पर है। आज भी इस तबके का झुकाव रामविलास पासवान की पार्टी की ओर ही है। नीतीश कुमार ने जब महादलित वर्ग बनाया तो उसमें पासवान जाति को शामिल नहीं किया। बाद में रामविलास पासवान के कहने पर 2018 में इस जाति को महादलित का दर्जा दिया। अब जब पशुपति पारस का झुकाव नीतीश कुमार की ओर है तब इसका फायदा जदयू को मिल सकता है।
वहीं तेजस्वी भी चिराग को अपना इसलिए बता रहे कि उन्हें पता है कि अगर पासवान वोट का कुछ हिस्सा भी उन्हें मिल गया तो उनकी जीत की राह थोड़ी आसान हो जाएगी। लोजपा में टूट के बाद राजद को प्रदेश की सियासत में उलटफेर की संभावना दिख रही थी। इसलिए हमदर्दी जताते हुए तेजस्वी ने चिराग को भाई तक कहा।

यही हाल बीजेपी का है। उसे सवर्णों के करीब 14 फीसद वोट का भरोसा है और इसी के साथ वह हिंदुत्व के साथ ओबीसी का कार्ड खेल रही है। अगर पासवान का वोट मिल जाए तो जीत तय हो सकती है। जानकारों का कहना है कि इसी कारण बीजेपी दोतरफा खेल रही है। पशुपति पारस को एक तरफ केंद्रीय मंत्री बना दिया तो वहीं दूसरी तरफ चिराग पासवान के भी हर आयोजन में बीजेपी उनके साथ खड़ी हो जाती है।
साफ है, पार्टी चिराग को भी नाराज नहीं करना चाहती है। चाचा पशुपति पारस और भतीजे चिराग पासवान के बीच की जंग भी इसी वोट बैंक को लेकर है। उन्हें अच्छी तरह पता है कि इसी के सहारे रामविलास पासवान ने 50 वर्षों तक राजनीति की और इस वोट बैंक की सहानुभूति उनके निधन के बाद भी कायम रह सकती है।



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