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ईरान युद्ध का असर: डॉलर के मुकाबले रुपया 94.70 पर, क्या 100 तक जाएगा?

dollar vs rupee
अमेरिका-इजराइल और ईरान युद्ध की वजह से भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगातार कमजोर होता जा रहा है। अंतरबैंक विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार में शुक्रवार (27 मार्च, 2026) को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया 94.70 के नए एक दिन के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया।
 

कमजोर होता चला गया रुपया


15 अगस्त 1947 में एक डॉलर की कीमत 4.16 रुपए थी। इसके बाद डॉलर लगातार मजबूत होता चला गया और रुपए की स्थिति बेहद कमजोर हो गई। 1991 में खाड़ी युद्ध और सोवियत संघ के विघटन के कारण भारत बड़े आर्थिक संकट में घिर गया और डॉलर 26 रुपए पर पहुंच गया। 1993 में एक अमेरिकी डॉलर खरीदने के लिए 31.37 रुपए लगते थे। साल 2008 खत्म होते रुपया 51 के स्तर पर जा पहुंचा। 
 
26 मई 2014 को नरेन्द्र मोदी ने एनडीए के प्रचंड बहुमत के बाद देश की बागडोर संभाली थी, उस समय डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत करीब 58.93 रुपए थी। मोदी राज में डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर ही बना रहा। डॉलर तेजी से कुलाचे भरता रहा और जुलाई 2022 में इसने 80 का आंकड़ा छू लिया। जनवरी 2025 में 1 डॉलर की कीमत 87 रुपए थी। ईरान युद्ध की वजह से डॉलर के मुकाबले रुपए कमजोर होता चला गया। 28  दिनों में यह 3.5 फीसदी गिर चुका है।
rupee all time low on 27 march

क्यों गिर रहा है रुपया?

ईरान में जारी संकट की वजह से डॉलर लगातार मजबूत हो रहा है। विदेशी संस्थागत निवेशकों द्वारा भारतीय बाजारों से पूंजी की लगातार निकासी, कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के चलते रुपए पर लगातार दबाव बना हुआ है।
 

क्या 100 रुपए हो जाएगी 1 डॉलर की कीमत?

अगर युद्ध काल में कच्चे तेल की कीमतें 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच जाती है तो क्या रुपए की कीमत तेजी से गिरेगी। स्ट्रेट हार्मूज से तेल सप्लाय लंबे समय तक प्रभावित रहने की स्थिति में भी दुनिया भर के देशों में ऊर्जा संकट गहराएगा। इस स्थिति में भी रुपए के मुकाबले डॉलर और मजबूत होगा। लगातार शेयर बाजार और सोने चांदी की कीमतों में गिरावट की स्थिति में भी रुपया तेजी से कमजोर होगा।
 
बहरहाल रिजर्व बैंक अगर मामले में दखल देता है तो डॉलर बेंचकर रुपए की कमजोरी को थामा जा सकता है। अगर भारत का एक्सपोर्ट बढ़ता है। उसकी जीडीपी ग्रोथ बनी रहती है। विदेशी निवेश आता है तो रुपया भी मजबूत होगा।
 

क्या होगा आप पर असर?

किसी भी देश की अर्थव्यवस्था के लिए अपनी मुद्रा का टूटना चिंताजनक संकेत होता है, क्योंकि इससे न सिर्फ महंगाई बढ़ने का खतरा बढ़ता है बल्कि आम जनता की जेब पर भी असर पड़ता है। रुपए की गिरावट का मतलब है कि आयातित सामान के लिए ज्यादा रुपये चुकाने पड़ेंगे। भारत आयात पर बहुत निर्भर है – कच्चा तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स, सोना और दालें जैसी चीजें विदेश से आती हैं। ऐसे में इन वस्तुओं के दाम बढ़ सकते हैं।
 
आम परिवारों के लिए रुपए की इस गिरावट का तत्काल असर दैनिक खर्चों पर नहीं दिखेगा। इसका सीधा प्रभाव उन लोगों पर पड़ेगा जो विदेश में पढ़ाई कर रहे छात्र हैं। विदेश यात्रा की योजना बना रहे हैं।
 
युद्ध की वजह से क्रूड के दाम 108 डॉलर प्रति बैरल पार हो चुके हैं। क्रूड के महंगे होने के साथ ही डॉलर के मुकाबले रुपए की कमजोरी से तेल कंपनियों पर दोहरी मार पड़ रही है। भारत अपनी 80% से ज्यादा तेल जरूरत आयात करता है। रुपए के गिरने से तेल आयात बिल बढ़ जाता है, जिससे पेट्रोल-डीजल के दाम ऊपर चढ़ते हैं। सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी 10 फीसदी घटाकर तेल कंपनियों को फौरी राहत दी है।
edited by : Nrapendra Gupta
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