शिक्षाप्रद कहानी: बालक राम से 'परशुराम' बनने की गाथा
बहुत पुरानी बात है, महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका के एक बहुत ही आज्ञाकारी पुत्र थे, जिनका नाम था 'राम'। राम बचपन से ही बहुत शांत, बुद्धिमान और बलवान थे। वे अपने माता-पिता की सेवा करना अपना सबसे बड़ा धर्म मानते थे।
कठोर तपस्या और शिव का वरदान
राम को शस्त्र विद्या (हथियार चलाना) और शास्त्र (ज्ञान) दोनों में बहुत रुचि थी। उन्होंने भगवान शिव को अपना गुरु माना और हिमालय पर जाकर कई वर्षों तक कठिन तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और उन्हें एक जादुई कुल्हाड़ी भेंट की, जिसे 'परशु' कहा जाता था।
चूंकि उनके पास अब वह दिव्य 'परशु' हमेशा रहता था, इसलिए उनका नाम 'राम' से बदलकर 'परशुराम' पड़ गया।
माता-पिता के प्रति अटूट श्रद्धा की कहानी
परशुराम के जीवन की सबसे प्रसिद्ध कहानी उनके पिता के प्रति उनकी अटूट श्रद्धा की है। एक बार उनके पिता महर्षि जमदग्नि किसी बात पर माता रेणुका से क्रोधित हो गए। उन्होंने अपने पुत्रों को आज्ञा दी कि वे अपनी माता को दंड दें। बाकी भाई डर गए और उन्होंने ऐसा करने से मना कर दिया, लेकिन परशुराम जानते थे कि पिता की आज्ञा टालना अपराध है और पिता की तपस्या की शक्ति बहुत बड़ी है।
जब पिता ने परशुराम को आज्ञा दी, तो उन्होंने भारी मन से पिता की बात मान ली। महर्षि जमदग्नि उनके अनुशासन से बहुत प्रसन्न हुए और बोले, "पुत्र! मैं तुम पर बहुत खुश हूँ। मांगो, क्या वरदान मांगते हो?"
परशुराम ने तुरंत हाथ जोड़कर कहा, "पिताजी, यदि आप प्रसन्न हैं तो मेरी माता को पुनः जीवित कर दें और उन्हें यह याद न रहे कि क्या हुआ था।" पिता ने 'तथास्तु' कहा और माता रेणुका फिर से जीवित हो गईं। इस तरह परशुराम ने पिता की आज्ञा भी निभाई और अपनी बुद्धि से माता को भी बचा लिया।
कहानी से शिक्षा: बच्चों के लिए भगवान परशुराम के जीवन की यह कहानी अनुशासन, माता-पिता की भक्ति और क्रोध पर नियंत्रण की एक महान सीख देती है।
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