Baccho ki kahani: टपका का डर (लोककथा)
बच्चों के लिए भारत में एक से एक कहानियां हैं लेकिन आजकल इन कहानियों को कोर्स से हटा दिया गया है। ऐसी ही एक कहानी है 'टपका का डर'। टपका की कहानी उत्तर भारत की एक बहुत ही प्रसिद्ध और मजेदार लोककथा है। यह कहानी हमें सिखाती है कि 'अनजान डर' असली खतरे से भी ज्यादा भयानक हो सकता है। यहां इस कहानी का संक्षिप्त और रोचक रूप दिया गया है।
1. बुढ़िया और उसकी झोपड़ी
एक बार बहुत ज़ोरों की बारिश हो रही थी। एक बुढ़िया अपनी टूटी-फूटी झोपड़ी में रह रही थी। छत से पानी जगह-जगह टपक रहा था। बुढ़िया परेशान होकर अपनी हांडी और बर्तन इधर-उधर खिसका रही थी और झुंझलाकर बोली- "भैया, मैं तो इस बाघ-बघैले से इतना नहीं डरती, जितना इस टपका से डरती हूँ!"
2. बाघ की गलतफहमी
संयोग से एक बाघ बारिश से बचने के लिए उसी झोपड़ी के पीछे दुबका बैठा था। उसने जब बुढ़िया की बात सुनी, तो वह कांप गया। उसने सोचा- "यह 'टपका' कौन सा भयानक जानवर है, जिससे यह बुढ़िया मुझसे भी ज्यादा डरती है? जरूर यह कोई मुझसे भी बड़ा शिकारी होगा!" बाघ डर के मारे चुपचाप वहीं दुबका रहा।
3. कुम्हार और उसका गधा
उसी रात एक कुम्हार का गधा कहीं खो गया था। वह अंधेरे और बारिश में अपने गधे को ढूंढ रहा था। झोपड़ी के पास उसे धुंधली सी आकृति दिखी। उसने आव देखा न ताव, सोचा कि यही उसका गधा है। उसने आव देखा न ताव, उस पर लाठियां बरसानी शुरू कर दीं और उसके कान पकड़कर उसे घसीटते हुए अपने घर ले गया।
4. बाघ की हालत खराब
बाघ ने सोचा- "यही वह भयानक 'टपका' है! देखो, इसने मुझे कैसे पकड़ लिया और मेरी पिटाई कर दी।" डर के मारे बाघ ने चूं तक नहीं की और कुम्हार के पीछे-पीछे चल दिया। कुम्हार ने उसे ले जाकर खूंटे से बांध दिया।
5. सुबह का चमत्कार
जब सुबह हुई और उजाला फैला, तो कुम्हार और पूरे गांव वालों ने देखा कि गधे की जगह एक विशाल बाघ खूंटे से बंधा हुआ है। कुम्हार तो डर के मारे थर-थर कांपने लगा, लेकिन बाघ भी कम डरा हुआ नहीं था। जैसे ही कुम्हार ने डर के मारे उसकी रस्सी ढीली की, बाघ दुम दबाकर जंगल की ओर भाग खड़ा हुआ।
वह भागते हुए सोच रहा था- "आज तो इस 'टपका' से जान बची, अब कभी इंसानों की बस्ती की तरफ नहीं आऊंगा!"
कहानी की सीख (Moral): अज्ञानता और भ्रम इंसान (या जानवर) के मन में ऐसा डर पैदा कर देते हैं कि वह छोटी सी चीज़ को भी पहाड़ समझने लगता है।