dharma sangrah

बाल साहित्य : मेरे ईश्वर

Updated: सोमवार, 29 दिसंबर 2014 (12:03 IST)
प्रभु! लोभ, स्वार्थ का क्या तात्पर्य है?
प्रभु बोले- 'इस पर मेरा यह उत्तर है,
लोभ सारी वि‍पत्तियों की जड़ है,
स्वार्थ दुर्गुणों का जैसे कीचड़ है।'
 

 
सुख अनेक प्रकार के, भौतिक सुख बताता हूं,
सबसे बड़ा सुख है निरोगी काया।
दूसरा मां-बाप का प्यार पाया,
तीसरा सदाचारी मन व अंत में माया।
 
प्रभु! मेहनत करूं या भक्ति?
किसमें है सबसे अधिक शक्ति?
'जिन्हें मैंने बनाया उनके लिए मेहनत कर,
यही है सबसे बड़ी भक्ति।'
 
प्रभु! भटक रहा था अज्ञान के अंधकार में,
उजाला तुमने दिल खोल दिया।
मैं तो कुछ भी न था जब,
तुमने छूकर मुझे अनमोल किया।
 
मेरे पास देने के लिए कुछ नहीं है,
आपको क्या अर्पण कर सकता हूं।
मैं तो एक तुच्छ प्राणी हूं,
मात्र हाथ जोड़कर नमन कर सकता हूं।

साभार- छोटी-सी उमर (कविता संग्रह) 
लेखक के बारे में
अंशुमन दुबे (बाल कवि)
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