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बाल साहित्य : सुंदर गिलहरी आई

Updated: बुधवार, 5 नवंबर 2014 (11:50 IST)
- कमलसिंह चौहान
 

 
सुंदर गिलहरी आई 
अनुशासन की सीख लाई 
 
दाने खा इठलाती आई 
नन्हे हाथ हिलाती आई 
 
थकती नहीं है चलने में 
सोती नहीं है पलने में 
 
दाने बीच उठाकर चलती 
मिट्टी में भी दबाती चलती 
 
हाथ-पैर इसके फुर्तीले 
पीठ पर पट्टे सफेद-काले 
 
हमें देखकर यह शरमाई 
पेड़ों पर चढ़कर इतराई 
 
लंबी दूरी तय करती है 
समझ-बूझ से यह चलती है 
 
चंचल और छरहरी आई 
देखो सुंदर गिलहरी आई। 
 
(यह कविता हमें 'प्रभात' ने भेजी है जयपुर से।)
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