बालगीत : न भई पापा, ना-ना-ना
गरम जलेबी आलू छोला,
न भई पापा, ना-ना-ना।
शाम ढले जब भी घर आना,
बस कुछ ठंडा ले आना।
आइसक्रीम भी ला सकते हैं,
कुल्फी भी खिलवा सकते हैं।
कोका-कोला भी विकल्प है,
लस्सी हमें पिला सकते हैं।
जीरा पानी, गोल फुलकियां,
न भई पापा ना-ना-ना।
आम दशहरी चल जाएंगे,
खूब संतरे मिल जाएंगे।
पिलवाएंगे अगर शिकंजी,
सबके चेहरे खिल जाएंगे।
पिज्जा वर्गर और चाउमिन,
न भई पापा ना-ना-ना।
तरबूजों की भी बहार है,
अंगूरों पर क्या! निखार है।
खरबूजों के मजे अभी हैं,
बस मिलने का इंतजार है।
गोल इमरती, बरफी, चम-चम,
न भई पापा ना-ना-ना।
लेखक के बारे में
प्रभुदयाल श्रीवास्तव
12, शिवम सुंदरम नगर, छिंदवाड़ा, मध्यप्रदेश (Mo.-+919131442512)....
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