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पुनः संशोधित शुक्रवार, 1 जुलाई 2022 (23:37 IST)

तापमान बढ़ने और फिर घटने से हजारों प्रजातियां हो जाएंगी विलुप्त

केप टाउन। जलवायु परिवर्तन का इतिहास एक ऐसी चीज है, जिस पर लोग धीरे-धीरे विश्वास करने लगे हैं। फिर भी एक छोटा सा तबका ऐसा है, जो अभी भी सवाल करता है कि क्या यह वास्तविक है और मनुष्यों के कारण होता है। अब अधिकांश लोग भयावह गति से बढ़ते ताप को धीमा करने की कोशिश की वास्तविकता और समाधान और झूठी आशा के बीच के अंतर से जूझ रहे हैं। क्लाइमेट ओवरशूट की अवधारणा अगली चीज है जिस पर इन दिनों बात हो रही है।

जब तक तत्काल कार्रवाई नहीं की जाती है, उत्सर्जन के अगले कुछ दशकों में ग्रह के तेजी से गर्म होने का कारण बनने की आशंका है, जिससे वैश्विक औसत तापमान पेरिस समझौते के लक्ष्य से आगे निकल जाएगा, जिसका उद्देश्य वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस और 2 डिग्री सेल्सियस के बीच सीमित करना था। परिणामस्वरूप इस सदी के मध्य में तापमान बढ़ने का समय आएगा। फिर विचार यह है कि वातावरण से ग्रीनहाउस गैसों को खींचने के लिए नई लेकिन अभी तक अप्रमाणित प्रौद्योगिकियां और तकनीकें अंततः तापमान को सुरक्षित स्तर पर वापस लाएंगी।

अब तक वैज्ञानिक अनिश्चित थे कि पेरिस समझौते का तापमान लक्ष्य प्रकृति के लिए क्या अस्थाई रूप से ओवरशूटिंग (और फिर नीचे की ओर आना) करेगा। इसलिए पहली बार हमने पृथ्वी के तापमान को इन एहतियाती सीमाओं से अधिक होने और फिर दोबारा कम होने की अनुमति देने का समुद्री और भूमि-आधारित जीवों पर पड़ने वाले परिणामों का अध्ययन किया। दूसरे शब्दों में हमने देखा कि दो डिग्री सेल्सियस तापमान लक्ष्य को पार करने का गंतव्य तो हानिकारक होगा ही, वहां तक पहुंचने की यात्रा भी अपने आप में कम हानिकारक नहीं होगी।

परिणाम बताते हैं कि तापमान के अस्थाई रूप से बढ़ने के हजारों प्रजातियों पर अपरिवर्तनीय विलुप्तीकरण और अन्य स्थाई नुकसान होंगे। अगर मानवता इस दशक में उत्सर्जन में गहरी कटौती करने में विफल रहती है और बाद में उत्सर्जन को हटाने के लिए भविष्य की तकनीकों पर निर्भर रहती है तो दुनिया यही उम्मीद कर सकती है।

नुकसान तेजी से आता है और धीरे-धीरे जाता है
हमारे अध्ययन ने 2040 और 2100 के बीच के 60 बरसों में भूमि और समुद्र में रहने वाली 30000 से अधिक प्रजातियों पर दो डिग्री सेल्सियस से अधिक के वैश्विक तापमान के प्रभाव का मॉडल तैयार किया। हमने देखा कि उनमें से कितने ऐसे तापमान के संपर्क में आएंगे जो उनके प्रजनन और अस्तित्व में बाधा डाल सकते हैं और वे इस जोखिम में कितने समय तक रहेंगे।

तापमान में फिर से गिरावट आने के बाद भी प्रकृति को बढ़े हुए तापमान का नुकसान जल्दी भुगतना पड़ेगा और तापमान गिरने के बावजूद इसका असर जाते-जाते जाएगा। दो डिग्री सेल्सियस से ऊपर का वैश्विक तापमान कुछ ही वर्षों में दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण पारिस्थितिक तंत्र को बदल सकता है।

उदाहरण के लिए अमेज़ॅन बेसिन को लें। कुछ प्रजातियां वैश्विक औसत तापमान के स्थिर होने के लंबे समय बाद तक खतरनाक स्थितियों के संपर्क में रहेंगी- कुछ पर इनका असर 2300 के अंत तक बना रहेगा। इसका कारण यह है कि कुछ प्रजातियां, विशेष रूप से उष्णकटिबंधीय भागों में, गर्मी की उस सीमा के करीब रहती हैं जिसे वे सहन कर सकते हैं और इसलिए तापमान में अपेक्षाकृत छोटे परिवर्तन के प्रति संवेदनशील होते हैं और जबकि वैश्विक औसत तापमान अंततः सुरक्षित स्तर पर लौट सकता है, स्थानीय तापमान परिवर्तन वापस आने में समय लग सकता है।

इस जोखिम के परिणाम अपरिवर्तनीय हो सकते हैं और इसमें उष्णकटिबंधीय जंगल का सवाना में बदलना शामिल है। दुनिया एक महत्वपूर्ण वैश्विक कार्बन सिंक खो देगी, जिससे वातावरण में अधिक गर्म गैसें आएंगी।पश्चिमी प्रशांत महासागर में प्रवाल त्रिभुज सबसे अधिक प्रजाति-समृद्ध समुद्री पारिस्थितिक तंत्रों में से एक है और कई रीफ-बिल्डिंग कोरल, समुद्री कछुए, रीफ मछली और मैंग्रोव वनों का घर है।

हमारे अध्ययन से पता चला है कि कुछ समुदायों में, सभी या अधिकांश प्रजातियां कम से कम कुछ दशकों और दो शताब्दियों तक एकसाथ खतरनाक परिस्थितियों के संपर्क में रहेंगी। लाखों लोगों के लिए भोजन के स्रोत को बाधित करने के साथ-साथ गायब होने वाले कोरल और मैंग्रोव तटीय कस्बों और गांवों को बढ़ते समुद्र और बिगड़ते तूफानों से बचाने वाले प्राकृतिक अवरोध को हटा देंगे।

लौटने का कोई रास्ता नहीं
नीति निर्माताओं ने प्रजातियों के अस्तित्व के लिए दो डिग्री सेल्सियस तापमान की अधिकता के परिणामों की उपेक्षा की है। हमारे विश्लेषण से संकेत मिलता है कि यह नहीं माना जा सकता है कि एक बार तापमान फिर से दो डिग्री सेल्सियस कम हो जाने पर जीवन अपनी पुरानी सूरत में वापस लौट आएगा।

हमने पाया कि 3,953 प्रजातियों की पूरी आबादी उस सीमा से बाहर तापमान के संपर्क में होगी, जिसमें वे लगातार 60 से अधिक वर्षों तक विकसित हुई थीं। फिलीपीन साही 99 साल के लिए उसमें रहेगा, और मेंढक की एक प्रजाति आश्चर्यजनक रूप से 157 साल तक उसके प्रभाव में रहेगी। इतने बड़े और लंबे जोखिम में अपना अस्तित्व बचाए रखना किसी भी प्रजाति के लिए एक कड़ी चुनौती है।

कई दशकों में वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों को कम करने के लिए कार्बन डाइऑक्साइड हटाने और तथाकथित नकारात्मक उत्सर्जन प्रौद्योगिकियों पर भरोसा करना बहुत जोखिमभरा है। इस तकनीक में से कुछ, जैसे कार्बन कैप्चर और स्टोरेज, को अभी तक आवश्यक पैमाने पर प्रभावी नहीं दिखाया गया है। अन्य तकनीकों का प्रकृति पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, जैसे कि बायोएनर्जी, जहां पेड़ या फसलें उगाई जाती हैं और फिर बिजली पैदा करने के लिए जला दी जाती हैं।

उत्सर्जन में भारी कटौती में देरी का मतलब होगा कि दुनिया के तापमान में दो डिग्री सेल्सियस की अधिकता होना तय है। इस ओवरशूट की पृथ्वी पर जीवन को ऐसी खगोलीय कीमत चुकानी होगी, जिसकी भरपाई उत्सर्जन प्रौद्योगिकियां नहीं कर पाएंगी। बढ़ते तापमान को रोकने का प्रयास ग्राफ पर वक्रों को मोड़ने का एक अमूर्त प्रयास नहीं है : यह एक जीवित ग्रह के लिए अस्तित्व की लड़ाई है।(द कन्वरसेशन)
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