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प्रेरक व्यक्तित्व : गोविंद वल्लभ पंत

Written By WD
Updated: शनिवार, 10 सितम्बर 2016 (12:43 IST)
स्वतंत्रता सेनानी, उप्र के पहले मुख्यमंत्री एवं देश के दूसरे गृहमंत्री रह चुके गोविंद वल्लभ पंत जी का जन्म 10 सितंबर 1857 को अल्मोड़ा के खूंट (धामस) नामक गांव में में हुआ था। गोविंद बल्लभ पंत के पिता का नाम श्री 'मनोरथ पन्त' था। गोविंद जी का पूरा पालन उनकी उसकी मौसी 'धनीदेवी' ने किया। 10 वर्ष की आयु तक घर पर ही शिक्षा ग्रहण करने के बाद 1897 में उन्हें स्थानीय 'रामजे कॉलेज' में प्राथमिक पाठशाला में दाखिल कराया गया और 1899 में 12 वर्ष की आयु में उनका विवाह 'गंगा देवी' हुआ। विवाह के समय वे वह कक्षा सात में पढ़ते थे।

गोविंद जी ने लोअर मिडिल की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास करने के बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया तथा बी.ए. में गणित, राजनीति और अंग्रेजी साहित्य में शिक्षा ली। उस समय इलाहाबाद में उन्हें महापुरुषों का सान्निध्य और जागरूक, व्यापक और राजनीतिक चेतना से भरपूर वातावरण भी मिला। आगे चलकर उन्होंने वकालत की शिक्षा ली और 1909 में गोविंंद बल्लभ पंत को कानून की परीक्षा में विश्वविद्यालय में सर्वप्रथम आने पर 'लम्सडैन' स्वर्ण पदक प्रदान किया गया।
 
1910 से ही उन्होंने अपने गृहक्षेत्र अल्मोड़ा में वकालत शुरु की और उसके बाद कुछ महीने रानीखेत में वकालत करने के बाद वे काशीपुर आ गए। उन दिनों काशीपुर के मुकदमें एस.डी.एम. की कोर्ट में पेश हुआ करते थे और यह अदालत ग्रीष्म काल में 6 महीने नैनीताल व सर्दियों के 6 महीने काशीपुर में रहती थी। इस प्रकार पंत जी का काशीपुर के बाद नैनीताल से संबंध भी जुड़ गया। 
 
वकालत शुरु करने से पूर्व ही 23 वर्ष की आयु में पंतजी के पहले पुत्र और कुछ समय उनकी बाद पत्नी गंगादेवी की भी मृत्यु हो गई, जिसके बाद वे उदासीन रहने लगे और अब उनका पूरा समय काकून और राजनीति के लिए रह गया। 1912 में परिवार के दबाव डालने पर उन्होंने दूसरा विवाह किया। लेकिन उनकी यह खुशी भी ज्यादा समय तक न रह सकी। दूसरी पत्नी से उन्हें एक पुत्र की प्राप्ति हुई, लेकिन कुछ समस बाद ही बीमारी के चलते पुत्र की मृत्यु हो गई। पुत्र के बाद 1914 में उनकी दूसरी पत्नी भी स्वर्ग सिधार गई, जिसके बाद 1916 में 30 वर्ष की आयु में उनका तीसरा विवाह के काशीपुर के श्री तारादत्त पाण्डे जी की पुत्री 'कलादेवी' से हुआ। 
 
इस बीच 1914 में काशीपुर में 'प्रेमसभा' की स्थापना पंत जी के प्रयत्नों से ही हुई और पंत जी के प्रयत्नों से ही 'उदयराज हिन्दू हाईस्कूल' की स्थापना हुई। 1916 में पंत जी काशीपुर की 'नोटीफाइड ऐरिया कमेटी' में लिए गए। बाद में कमेटी की 'शिक्षा समिति' के अध्यक्ष बने। उन्होंने अपने जीवन में कई गतिविधियों की अगुवाई की। सन 1921, 1930, 1932 और 1934 के स्वतंत्रता संग्रामों में पंत जी लगभग 7 वर्ष जेलों में रहे। पंत जी 1946 से दिसंबर 1954 तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। 
    
 
गोविंद वल्लभ पंत अच्छे नाटककार भी रहे। उनका 'वरमाला' नाटक, जो मार्कण्डेय पुराण की एक कथा पर आधारित है, बड़ी निपुणता से लिखा गया है। मेवाड़ की पन्ना नामक धाय के अलौकिक त्याग का ऐतिहासिक वृत लेकर 'राजमुकुट' की रचना हुई है। 'अंगूर की बेटी' (जो फ़ारसी शब्द का अनुवाद है) मद्य में दुष्परिणाम दिखाने वाला सामाजिक नाटक है।
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