Osho Festival 2026: आध्यात्मिक गुरु ओशो (आचार्य रजनीश) के अनुयायियों के लिए 'महोत्सव' केवल एक तारीख नहीं, बल्कि जीवन को उत्सव की तरह जीने का एक दर्शन है। 11 दिसंबर 1931 को जन्मे ओशो, जिनका जन्म चन्द्रमोहन जैन के नाम से हुआ था, उनके अनुयायी 19 जनवरी को 'ओशो महापरिनिर्वाण दिवस' पर उनके व्यक्तित्व की पूजा के बजाय 'ध्यान के उत्सव' के रूप में मनाते हैं।
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आध्यात्मिक गुरु ओशो का महापरिनिर्वाण दिवस
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ओशो महोत्सव 2026 की प्रमुख तिथि
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ओशो महोत्सव के खास तथ्य
1. ओशो महोत्सव 2026: प्रमुख तिथि-
ओशो महापरिनिर्वाण दिवस: 19 जनवरी, वह दिन जब ओशो ने अपनी देह त्यागी थी।
2. ओशो का जीवन
ओशो का जन्म 1931 में मध्य प्रदेश के कुचवाड़ा में हुआ था। प्रतिवर्ष ओशो महोत्सव ओशो के अद्वितीय दर्शन, ध्यान पद्धतियों और उनकी जीवनशैली का सम्मान करने के लिए मनाया जाता है। यह महोत्सव विशेष रूप से ओशो आश्रम (पुणे Pune, भारत India) में आयोजित होता है और ओशो के अनुयायी और उनके विचारों से प्रभावित लोग इसे बड़े श्रद्धा और आस्था के साथ मनाते हैं। ओशो के जीवन और उनके ध्यान की विधियों के प्रचार-प्रसार के लिए यह एक बड़ा अवसर होता है, जहां लोग उनका संदेश और जीवनशैली सीखने के लिए एकत्रित होते हैं।
3. ओशो महोत्सव से जुड़े 10 अनसुने तथ्य
1. मौलश्री वृक्ष का रहस्य: जिस पेड़ के नीचे ओशो को ज्ञान प्राप्त हुआ था, वह आज भी जबलपुर में है। ओशो प्रेमियों के लिए यह स्थान 'बोधि वृक्ष' के समान पवित्र है।
2. सफेद और महरून रोब: महोत्सव के दौरान सन्यासी दिन में महरून और शाम को सफेद चोगे (White Robe) पहनते हैं। यह ओशो द्वारा दी गई एक विशेष ड्रेस कोड परंपरा है।
3. मौत नहीं, उत्सव: ओशो ने सिखाया कि मृत्यु का शोक नहीं, उत्सव मनाना चाहिए। इसलिए उनके महापरिनिर्वाण दिवस, 19 जनवरी पर रोने के बजाय लोग नाचते और गाते हैं।
4. म्यूजिक और ध्यान: ओशो महोत्सव में शास्त्रीय संगीत से लेकर रॉक और सूफी संगीत तक का समावेश होता है। उनका मानना था कि संगीत ध्यान की गहराई तक जाने का सबसे छोटा रास्ता है।
5. डायनेमिक मेडिटेशन/Dynamic Meditation: इन उत्सवों में ओशो द्वारा खोजी गई 'सक्रिय ध्यान' विधियों का अभ्यास कराया जाता है, जो पारंपरिक शांत ध्यान से बिल्कुल अलग और ऊर्जावान होती हैं।
6. 90 रोल्स रॉयस का किस्सा: ओशो महोत्सवों की चर्चा उनके अमेरिका (रजनीशपुरम) प्रवास के दौरान भी खूब रही, जहां उनके पास अनुयायियों द्वारा भेंट की गई 90 से ज्यादा रोल्स रॉयस कारें थीं।
7. वैश्विक उपस्थिति: ओशो महोत्सव केवल भारत (पुणे, जबलपुर, ऋषिकेश) में ही नहीं, बल्कि इजरायल, अमेरिका और यूरोप के कई देशों में बड़े स्तर पर आयोजित किए जाते हैं।
8. समानता का भाव: इन महोत्सवों में कोई छोटा या बड़ा नहीं होता। सभी सन्यासी अपने नाम के आगे 'स्वामी' या 'मां' लगाते हैं, जो अहंकार मिटाने का प्रतीक है।
9. कोई धार्मिक अनुष्ठान नहीं: ओशो के किसी भी उत्सव में कोई मूर्ति पूजा या पारंपरिक कर्मकांड नहीं होता। यहां केवल ध्यान, प्रवचन और नृत्य होता है।
10. समाधि का संदेश: पुणे आश्रम में उनकी समाधि पर लिखा है- 'ना कभी जन्मे, ना कभी मरे, सिर्फ 11 दिसंबर 1931 और 19 जनवरी 1990 के बीच इस पृथ्वी ग्रह की यात्रा पर आए।'
ओशो के विचार, जीवन और कार्य आज भी हमें प्रेरित करते हैं और जीवन में संतुलन और खुशी की ओर मार्गदर्शन करते हैं।
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