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जब पाकिस्तान के वैज्ञानिकों के बालों ने खोला परमाणु कार्यक्रम का राज, जानिए ऑपरेशन कहुटा में भारत की कौनसी चूक पड़ी भारी

Operation Kahuta
operation kahuta story in hindi: हाल ही में वेब सीरीज सलाकार ने भारत में खूब सुर्खियां बटोरी हैं. यह सीरीज 1970 के दशक में भारत की खुफिया एजेंसी रॉ (रिसर्च एंड एनालिसिस विंग) के एक गुप्त मिशन 'ऑपरेशन कहुटा' पर आधारित है। इस मिशन का मकसद था पाकिस्तान के गुप्त परमाणु हथियार कार्यक्रम को उजागर करना।
1974 में भारत के पहले परमाणु परीक्षण 'स्माइलिंग बुद्धा' ने पूरे एशिया में हलचल मचा दी थी। इस परीक्षण ने पाकिस्तान को भी परमाणु हथियार बनाने के लिए प्रेरित किया। डॉ. अब्दुल कादिर खान, जिन्हें पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम का जनक माना जाता है, ने रावलपिंडी के पास काहुटा में एक गुप्त यूरेनियम संवर्धन संयंत्र (enrichment plant) शुरू किया। यह संयंत्र पाकिस्तानी सेना और आईएसआई (इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस) के कड़े सुरक्षा घेरे में था, जिससे इसमें घुसपैठ करना लगभग असंभव था। लेकिन, भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ (RAW) ने एक ऐसा तरीका निकाला, जिसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की थी।

बालों से मिला सबसे बड़ा सबूत
रॉ के तत्कालीन प्रमुख, रमेश्वर नाथ काव (R.N. Kao), जिन्हें ‘कावबॉय’ के नाम से भी जाना जाता था, ने पाकिस्तान में अपना एक मजबूत जासूसी नेटवर्क स्थापित किया। यह नेटवर्क पाकिस्तान की गतिविधियों पर करीब से नजर रख रहा था। काहुटा में घुसपैठ सीधे-सीधे तो संभव नहीं थी, लेकिन रॉ के जासूसों को पता चला कि काहुटा के परमाणु वैज्ञानिक अक्सर पास की एक स्थानीय नाई की दुकान पर बाल कटवाने जाते थे।
यह जानकारी रॉ के लिए सोने पर सुहागा साबित हुई। रॉ के जासूसों ने चुपचाप उस नाई की दुकान से उन वैज्ञानिकों के कटे हुए बाल इकट्ठा करना शुरू कर दिया। ये बाल खुफिया तरीके से भारत लाए गए और एक प्रयोगशाला में इनकी जांच की गई। जांच के नतीजों ने सबको चौंका दिया। वैज्ञानिकों के बालों में रेडिएशन (विकिरण) के निशान मिले, जो यह साबित करने के लिए पर्याप्त थे कि काहुटा में यूरेनियम का संवर्धन (enrichment) हो रहा है। यह पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम का सबसे बड़ा और पुख्ता सबूत था। इस मिशन में इजराइल की खुफिया एजेंसी मोसाद ने भी रॉ की मदद की थी, क्योंकि इजराइल को डर था कि पाकिस्तान का परमाणु बम (जिसे 'इस्लामिक बम' कहा जा रहा था) मध्य-पूर्व में उनके लिए खतरा बन सकता है।

एक गलती और जासूसी मिशन का अंत
जब रॉ ने यह चौंकाने वाला सबूत तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई को सौंपा, तो भारत के पास पाकिस्तान के इस गुप्त परमाणु कार्यक्रम को रोकने का मौका था। लेकिन, एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना ने इस पूरे ऑपरेशन पर पानी फेर दिया। खबरों के अनुसार, मोरारजी देसाई ने एक अंतरराष्ट्रीय शिखर सम्मेलन के दौरान अनजाने में तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्रपति जनरल जिया-उल-हक के सामने यह बात कह दी कि भारत को उनके परमाणु कार्यक्रम के बारे में पता है और वह उसे रोकने में सक्षम है।

इस गलती के कारण जनरल जिया-उल-हक को रॉ के जासूसी नेटवर्क की जानकारी मिल गई। पाकिस्तान ने तुरंत अपने देश में सक्रिय सभी भारतीय जासूसों को पकड़ना और उनका सफाया करना शुरू कर दिया। यह मिशन यहीं खत्म हो गया, और भारत ने पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम को रोकने का एक बड़ा अवसर खो दिया।
इस तरह, 'ऑपरेशन काहुटा' भारतीय जासूसी के इतिहास में एक शानदार और सफल मिशन था, लेकिन एक राजनीतिक चूक की वजह से इसका परिणाम दुखद रहा।

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WD Feature Desk
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