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हिंदी कविता : प्रकृति धर्म

शुक्रवार,मई 22, 2020
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भगवन मेरे, पथिकों की डगर को मखमली रखना हाथों को निवाले भी उजास भी पूरा का पूरा रहने देना सूरज में चांद की शीतलता और ठंडाये रखना...
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कितने वर्षों बाद मुझे तुमसे मिलने वहां आना, अच्छा लगा था। वहां लकड़ी की सिर्फ दो ही कुर्सियां और बीच में कांच लगा टेबिल जो हमारी तरह पूरा पारदर्शी था।
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मां मैं खुश होती हूं जब बनाती हूं बची हुई रोटियों से रोटी पिज़्ज़ा! या जब काट लेती हूं पुरानी कढ़ाई वाली चुन्नी से छोटे-छोटे खूबसूरत स्कार्फ! या जब नया कुछ ना खरीद कर सज्जा बदल पुनरउपयोगी कर लेती हूं पुरानी साड़ियां और गहने!
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मां मेरे हिस्से बहुत कम आती है..! शिकायत नहीं, बस एक हकीकत है. मां हूं, पर मां की मुझे भी ज़रूरत है. देहरी लांघने से बेटी क्या बेटी नहीं रह जाती है?
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जब मैं तेरे आंगन में एक फूल की मानिंद खिला तू देख के मुझको जीती थी मेरे आंसू पीती थी मां ओ मां! अक्सर डरकर मैं छुप जाता था तेरे आंचल में ख़ुशियों के सारे रंग मैं पाता था तेरे आंचल में मेरे लिए तू ही सारी दुनिया थी तेरी झोली में ही तो ...
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द गीले में सो, हमें सूखे में सुलाने वाली, वह मां तो खुद ईश्वर का रूप होती है। वह अनमोल खजाना है स्नेह का, वह हीरा है, सोना है, मोती है। लेकिन दुनिया में सबसे बदनसीब है वो, जिनके सर मां के आंचल की छांव नहीं होती है।
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सबसे खूबसूरत है वह जिसके माथे और हथेलियों पर मां ने काला दीठौना लगाया हो। सबसे तृप्त है वह जिसे मीठी झिड़की के साथ मां ने आखिरी दो निवाले खिलाए हो। सबसे निश्चिंत है वह जो मां का आंचल मुट्ठी में भर गहरी नींद में सोया हो। सबसे निडर है ...
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जनम इस दुनिया में जिसके आंचल की छांव ने बचाया धूप से वह मां, जो उठ जाती है, सबके उठने के पहले ही,
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माँ, तुम्हारी स्मृति, प्रसंगवश नहीं अस्तित्व है मेरा। धरा से आकाश तक शून्य से विस्तार तक। कर्मठता का अक्षय दीप मंत्रोच्चार सा स्वर अनवरत प्रार्थनारत मन जीवन यज्ञ में स्वत: समिधा बन पुण्य सब पर वार। अवर्णनीय, अवर्चनीय तुम सर्वस्व ...
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बेसन की सोंधी रोटी पर खट्‍टी चटनी-जैसी मां याद आती है चौका-बासन चिमटा, फुकनी-जैसी मां
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हिंदी साहित्य में कवि सूरदास का नाम प्रमुख है। उन्होंने कृष्ण लीला को अपने काव्य का विषय बनाया। प्रस्तुत हैं कवि सूरदास जी द्वारा लिखित कुछ महत्वपूर्ण काव्य पद।
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पृथ्वी मेरी मां की तरह चिपकाए हुए है मुझे अपने सीने में।मेरे पिता की तरह पूरी करती है मेरी मेरे पिता की तरह
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हे विप्र शिरोमणि परशुराम, मैं तुम्हें बुलाने आया हूं। अपने हृदय की व्यथा कथा, तुमको बतलाने आया हूं।
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कितना पकड़ेगा वह शेष छुटी हुई इस गुनगुनी साँझ को कि जब लौटता था खेतों से , तो धूल का पूरा का पूरा गुबार खेत की मेड़ मुड़ते ही मुँह और आंखों में किरकिरा जाता था पर हिस्सा था वो जीने के ढंग का मेहनत के रंग का...
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ज़िन्दगी में खुशियाँ फिर लौटेंगी एक दिन मिल बैठेंगे हम सब यार एक दिन अदरक वाली चाय और चटपटे समोसों से फिर गुलज़ार होगी सुनी मेज़ एक दिन हँसी ठहाके वो बेपरवाह मस्ती से फिर जमेगी यारों की महफ़िल एक दिन
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संभाल कर रखिए जनाब ये फ़ुरसत के लम्हें बड़ी क़ीमत अदा कर ये दौर ए सुकूं पाया है अपने हाथों से दे रहे थे ज़ख्म बेहिसाब कुदरत ने तो बस आज आईना दिखाया है सिमट आए है रिश्ते चार दिवारी में खौफ ने ही सही, मकान को घर तो बनाया है
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तो बांटने की प्रथा को जारी रखते हुए.. आज बांटते हैं.. रोशनी..नन्हे दीप की.. जो जले मेरी देहरी पर,उजाला हो तेरे आंगन में .... जो जले तेरी देहरी पर,उजाला हो मेरे मन में.. इस तरह जले करोड़ों दीये और उजाला हो.. इस धरा पर,उस गगन में .. समूची दुनिया ...
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कवि‍ता: क्वारंटाईन और दीवारें

शुक्रवार,अप्रैल 3, 2020
कितना कुछ सुनना चाहती हैं ये दीवारें..!
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भीतर मेरे कई मुखौटे, कई पहरे परछाइयां,कई तहों में छिपे सिमटे, बंद आंखों में भीतर गुपचुप!
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