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रामधारी सिंह दिनकर की 'चाँद' पर कविता : रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद

बुधवार,सितम्बर 23, 2020
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ग्रीष्म के दिनों में आम, जाड़े के दिनों में जाम, बाग में खिले कुसुम मंद-मंद बहती समीर
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हिन्दी कविता : अजन्मी का जन्म

शुक्रवार,सितम्बर 18, 2020
रोजगार ढूंढता पति, वो ससुराल में है पड़ी कैसे चले घर का खर्च ये आफत भी आन पड़ी,शर्म नहीं आई ऐसे में, हो गई गर्भवती तू
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हिन्दी में बेरोजगारी पर कविता- मैं एक बेरोजगार हूं कर रहा बेगार हूं, बड़े-बुजुर्गों की आंख से मैं आज बेकार हूं। इम्प्लॉयमेंट एक्सचेंज मेरा आज शिवाला है, फॉर्म भरते-भरते मेरा निकल गया दिवाला है।
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मैं वह भाषा हूं, जिसमें तुम जीवन साज पे संगत देते मैं वह भाषा हूं, जिसमें तुम, भाव नदी का अमृत पीते मैं वह भाषा हूं, जिसमें तुमने बचपन खेला और बढ़े हूं वह भाषा, जिसमें तुमने यौवन, प्रीत के पाठ पढ़े...
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हम फिर से आएंगे तेरे शहर को बसाने, पर आज तुम न देखो, हमारे पैरों पर पड़े छाले, क्यों आंखें भर आईं हमारी, क्या-क्या हम पर है बीता
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दरवाजे पे आ जा चिरैया तोहे मुनिया पुकारे मुनिया पुकारे तोहे, मुनिया पुकारे
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सब इतिहास की तरह ज़माने के सामने हैं
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शिवमंगल सिंह 'सुमन' द्वारा स्वतंत्रता दिवस की प्रथम वर्षगांठ पर लिखी गई कविता।
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वो आजादी बहिश्तों की हवाएं दम भरें जिसका, वो आजादी फरिश्ते अर्श पर चरचा करें जिसका, वो आजादी शराफत जिसकी खातिर जान तक दे दे
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आ जाओ कृष्ण...देखो अब बोल भी छूट चले, शब्दों को भी खोती हूं एक-एक प्रेम पुष्प को, भाव माल में पिरोती हूं
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सौम्य सुदर्शन शामल सुंदर, नीलमणी सम रोचन उज्ज्वल, रणवीर धुरंधर वीर धनुर्धर, असुर निकंदन दशरथ नंदन
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ढ़ीठ होती हैं यादें, बेबाक होती हैं यादें, बेवक्त की बारिश सी सनकी होती हैं यादें, दुआ मरहम से भी लाइलाज होती हैं, पुराने ज़ख्मों सी ज़िद्दी होती हैं यादें
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एक लौ उम्मीद की रौशन कर लो
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याद है पिछली छुट्टियों से भी पहले वाली छुट्टियों में हम जब बादलों को न्योता देने उनके घर गए थे....
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कर्म की व्याख्या क्या करूं जो करवाते हो वह कर्म तुम्हीं को समर्पित मेरे कर्म यदि मेरे नहीं तो फल भी नहीं मेरे मेरे धर्म तुम्हारे तुम्हीं हो धर्मप्रवर्तक मेरे...
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एक भीनी सी खुशबू हूं, हवाओं में घुल जाने दो मुझे।  आसमान को छूता परिंदा हूं उड़ जाने दो मुझे।।
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चल आ यार थोड़ी बात कर लेते हैं, जो भी समस्या हो जीवन की उसे सुलझा लेते हैं
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चलो-चलो कवि लिखों मेघों पर कविता, बरसेंगे आंगन-आंगन हरा-भरा ह्दय होगा
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लेकिन आज भी, पिता के वात्सल्य के मायने नहीं बदले
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