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कविता : आज बांटते हैं.. रोशनी नन्हे दीप की..

रविवार,अप्रैल 5, 2020
poem on deepak
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कवि‍ता: क्वारंटाईन और दीवारें

शुक्रवार,अप्रैल 3, 2020
कितना कुछ सुनना चाहती हैं ये दीवारें..!
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भीतर मेरे कई मुखौटे, कई पहरे परछाइयां,कई तहों में छिपे सिमटे, बंद आंखों में भीतर गुपचुप!
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चिकित्सकों ने सीमित ज्ञान से चेचक हैजा जीता, अब अथक ज्ञान समुद्र से कोरोना जंग जीत लेंगे !
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मैं हूं आपकी इंदौर नगरी , हमेशा रहती हूँ साफ़ सुथरी। कोरोना है परीक्षा की घड़ी , किसकी लगी हाय नज़र बुरी। उफ़ ये कैसा दिन आया, घर बंदी से जी घबराया। कुछ लोग खो रहे आपा, डॉक्टर को भी दे रहे ताना।
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ना तुम जल्दी ऑफ़िस जाना, ना तुम देर से घर आना, घर से ही काम कर काम चलाना !
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वंदना उनकी करें जो, खेल कर निज जान पर। कर रहे सेवा निरंतर, आज मुश्किल हाल पर। व्यथित हैं घर पर सभी, कर्तव्य पथ पर यह डटे रोगियों का कष्ट हरने, से नहीं पीछे हटे। मरीजों का कष्ट हरते, औषधि उपचार से। और मनोबल भी बढ़ाते,प्रेरणा उत्साह ...
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हाथ मिलाने की जगह,करें नमस्ते आप।
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सीनें में जुनूं, आंखों में देशभक्ति की चमक रखता हूं दुश्मन की सांसें थम जाए, आवाज में वो धमक रखता हूं ...पढ़ें भगत सिंह के वतन पर लिखे 7 शेर -
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कल रात सपने में आया कोरोना.... उसे देख जो मैं डरातो मुस्कुरा के बोला मुझसे डरो ना... उसने कहा- कितनी अच्छी है तुम्हारी संस्कृति। न चूमते,न गले लगाते
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मोदी जी का ये अभियान, याद रखेगा हिंदुस्तान।। घंटी, थाली और मंजीरे बजने से भागेंगे कीड़े,.गिनीज बुक में आएगा नाम। गर्व करेगा हिंदुस्तान।
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होली के दिन की ये मुलाकात याद रहेगी रंगों की ये बरसात याद रहेगी आपको मिले रंगीन दुनिया ऐसी हमेशा ये मेरी दुआ रहेगी… होली मुबारक...पेश है 10 मजेदार, मस्ती भरे सुंदर संदेश... देर किस बात की अपनी पसंद का कॉपी कीजिए और भेज दीजिए अपने अपनों को...
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होली हो ओछी राजनीति की, टुच्चे बयानों की होली हो। येन-केन सत्ता हथियाने के बेशर्म अरमानों की होली हो।।
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नारी का सम्मान, बचाना धर्म हमारा, सफल वही इंसान, लगे नारी को प्यारा। जीवन का आधार, हमेशा नारी होती,
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जिन पेड़ों की छांव से, काला पड़े गुलाल उनकी जड़ में बावरे, अब तो मठ्ठा डाल। बिल्ली काटे रास्ता, गोरी नदी नहाय चल खुसरो घर आपने, फागुन के दिन आय।
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मां-बेटी-पत्नी-बहन, नारी रूप हजार, नारी से रिश्ते सजे, नारी से परिवार। नारी बीज उगात है, नारी धरती रूप,
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नारी तुम स्वतंत्र हो, जीवन धन यंत्र हो। काल के कपाल पर, लिखा सुख मंत्र हो। सुरभित बनमाल हो, जीवन की ताल हो।
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क्यों मिले तुम्हें समय पर नाश्ता खाना... और हमें मिले रूखा-सूखा... क्यों मिले तुम्हें जैसा चाहे जीना.. और हमें मिले, तुम जैसा चाहो जीना.. क्यों मिले तुम्हें निर्भय होकर जीना..
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सालों हो गए, दुनिया चलती रही ऋतुएं बदलती रहीं क्या रुका कुछ? दुनिया में तुम्हारी या उन चारों की ..? इतनी सांसें मिल गई उन्हें उपहार में जीते रहे वे खुल के जिंदगी बिना किसी डर या दर्द के..! वे चार जिन्होंने मेरी जिंदगी को कर दिया था पल ...
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हमारी दक्ष कूटनीति की यह सचमुच बड़ी विजय है। रूस हो, चीन या अमेरिका सभी से हमारे संबंधों में समन्वय है।।
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