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ग़ज़ल- आज़ाद है ’शाहीन’, कैद में बाग है

सोमवार,फ़रवरी 24, 2020
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भारतीय दार्शनिक जे. कृष्णमूर्ति कहते हैं- किसी भी चीज की गहरे तक समझ और चीज की त्वरित समझ। यहां तक कि समझने के लिए ध्यान पूर्वक सुनना। कई मर्तबा आप सिर्फ देखते हैं, मगर सुनते नहीं। कुछ सीखने के बाद आप वैसा करने लगते हैं, इसका मतलब हुआ जब सीखने की ...
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यह कहानी ऐसे कर्मों के फल भी है जिसे आपने कभी नहीं किया। फिर भी आपको कैसे यह दोष लगा? जानिए महाभारत की दिलचस्प कहानी।
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चाहे कितना भी तुम मना करो, मान भी जाओ कि तुम मेरी हो। तपते जीवन की धूपों में, तुम शीतल छांव घनेरी हो।
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‘रिसरेक्शन’ रशियन उपन्यासकार लियो टॉलस्‍टॉय का आखिरी उपन्‍यास था। इसमें वे मनुष्‍य के बारे में लिखते हैं- एक बहुत ही आम मान्‍यता है कि प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति में एक खास गुण होता है। जैसे कोई दयालु होता है, कोई दुष्‍ट होता है, कोई समझदार होता है तो कोई ...
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बहुत से लोग कहते हैं कि हम कर्मों के अधीन है, कुछ कहते हैं कि हम भाग्य के अधिन है और अधिकतर मानते हैं कि ईश्‍वर की इच्‍छा के बैगेर कुछ भी नहीं होता है। हम ईश्वर के बंधन में हैं। मतलब यह कि हम स्वतंत्र नहीं है। कर्म, भाग्य, नियति और ईश्वर से हम बंधे ...
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महात्मा गांधी को प्रिय 'वैष्णव जन तो तेने कहिए' यह भजन 15वीं शताब्दी के गुजरात के संत कवि नरसी मेहता द्वारा रचित एक अत्यंत लोकप्रिय भजन है।
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गाओ सखी होकर मगन आया है वसंत राजा है ये ऋतुओं का आनंद है अनंत। पीत सोन वस्त्रों से सजी है आज धरती आंचल में अपने सौंधी-सौंधी गंध भरती।
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Girl Child Day : 'बेटी' युग का नया दौर

शुक्रवार,जनवरी 24, 2020
बेटी युग में खुशी-खुशी है, पर मेहनत के साथ बसी है। शुद्ध कर्म-निष्ठा का संगम, सबके मन में दिव्य हंसी है।
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जिस दिन से घर में आती हैं बेटियां, माता-पिता की इज्जत बन जाती हैं बेटियां। भारत के विकास की डोर थामे हैं बेटियां,
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गणतंत्र के इतने वर्षों में, क्या खोया क्या पाया है....खोने की तो फिक्र नहीं, पाने की चाह सब रखते हैं...सदियों के तप के बाद मिली, आज़ादी की नेमत हमको..
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गणतंत्र दिवस दिन वे निराले स्वर्णाक्षरों में है जिन्हें इतिहास संभाले इनके लिए हर भारतीय मन में है सम्मान इनने ही दिए हमको अंधेरों में उजाले फूले फले समृद्ध हो
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गणतंत्र दिवस फिर आया है। नव परिधान बसंती रंग का माता ने पहनाया है। भीड़ बढ़ी स्वागत करने को बादल झड़ी लगाते हैं। रंग-बिरंगे फूलों में ऋतुराज खड़े मुस्काते हैं। धरनी मां ने धानी साड़ी पहन श्रृंगार सजाया है।
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मैं एक सुबह उठकर निकल पड़ता हूं कार्यालय के लिए दौड़कर मेट्रो को पकड़ता हूं
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कि देखो, फागुन भी टोह ले रहा और खेतों की मेड़ पर उग आईं हैं टेसू चटकाती सुर्ख होती डालियां तो किसी शीत भरी पर गुनगुनी शाम की तरह गुज़र जाओ इस गली अंजुली भर गरमाहट लेकर आभासों के मेरे सूरज मन की मकर राशि में छा जाओ देव ...
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वह पहली छत के दरवाजे की चौखट थामे मांगती रही सदा उसके हिस्से का आकाश उड़ाने के लिए अपनी पतंग! फकत मांगने से, नहीं मिला कभी उसे उसके हिस्से का आकाश और उड़ा न सकी वह आज तक अपनी कोई पतंग ! उस दूसरी ने कभी नहीं मांगा आकाश का कोना बस ...
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आई खिचारहाई कहीं देश के एक कोने में कहते लोग इसे खिचारहाई, कहीं कहते मकर संक्रांति तो कहीं पतंगबाजी के लिए होती इसमें बेटियों की पहुनाई (मेहमाननवाजी)।
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महानगर के व्यस्ततम सड़कों पर घने कोहरे और हड्डियों को कंपा देने वाली शीत के मध्य बड़ी-बड़ी गाडियों में लोग गतिमान हैं
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उठो, सबेरा हुआ चांद छुप गया रंग बदल गया भानु दस्तक देने लगा दरवाजे पर चिड़ियों की चहचाहट
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यह सर्दी बरपा रही है कैसा कहर। आलम को गिरफ्त में लिए है शीतलहर। ठिठुरन के आगोश में हर बस्ती, गांव, शहर। पारा और भी गिर-गिर जाता है शामो-सहर।।1।।
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