सौंधी सच्ची आंच हूं
अनुप्रिया
ना मैं इन्द्रधनुष की सतरंगी डोर जिससे बंधे हैं जिन्दगी के सारे रंग,ना मैं नीले आकाश का विस्तार जिसकी बांहों में खिलते चांद-सितारेना मैं पंखों की ऊंची उड़ान कि छू सकूं बादलों की गहरी बेचैनियां पर हां अनचाही ही सही तुम्हारे भीतर उग आई सौंधी सच्ची आंच हूं दिपदिप जलने को प्रतिबद्ध।