poem | शरद की दमकती रात में
फाल्गुनी
शरद की दमकती रात में,
प्रश्नाकुल मन,
बहुत उदास,
कहता है मुझसे,
उठो, चाँद से बातें करो
और मैं,
बहने लगती हूँ
श्वेत सौम्य चाँदनी में, तब,
तुम बहुत याद आते हो।
मैं शरद के चाँद में
ढूँढती हूँ तुम्हारा चेहरा
और मेरे चेहरे पर खिल उठती है
वही शरदीया मुस्कान और
चाँद मुझसे रात भर बातें करता है।
ND
प्रश्नाकुल मन,
बहुत उदास,
कहता है मुझसे,
उठो, चाँद से बातें करो
और मैं,
बहने लगती हूँ
श्वेत सौम्य चाँदनी में, तब,
तुम बहुत याद आते हो।
मैं शरद के चाँद में
ढूँढती हूँ तुम्हारा चेहरा
और मेरे चेहरे पर खिल उठती है
वही शरदीया मुस्कान और
चाँद मुझसे रात भर बातें करता है।
