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मेरे शब्द-कंकर
फाल्गुनी शब्दों की गठरी से चुने थे मैंने कुछ कंकर कि फेंक सकूँ तुम पर, हो जाए तुम्हारा अस्तित्व छलनी लेकिन ये तुम थे कि लौटा दिए शब्द-कंकर फूलों के रूप में।यूँ भी भला कंकर से भी कोई छलनी हुआ है?