Hindi Poem | बेजान इन पत्थरों में
प्राजक्ता पराड़कर
नदी के इस तट पर बिखरे,
बेजान इन पत्थरों में भी,
अपनापन लगता है।
शहर से दूर,
इस अजनबी जगह पर
एक समां सुहाना लगता है।
खामोश इन नजारों में,
आता हुआ हवा का झोंका
अपना सा लगता है।
बहती हुई नदी का स्वर भी,
जाना-पहचाना लगता है।
स्वर्ण किरणों की उष्णता का
अंदाज भी निराला लगता है।
बेजान इन पत्थरों में भी
अपनापन लगता है।
बेजान इन पत्थरों में भी,
अपनापन लगता है।
शहर से दूर,
इस अजनबी जगह पर
एक समां सुहाना लगता है।
खामोश इन नजारों में,
आता हुआ हवा का झोंका
अपना सा लगता है।
बहती हुई नदी का स्वर भी,
जाना-पहचाना लगता है।
स्वर्ण किरणों की उष्णता का
अंदाज भी निराला लगता है।
बेजान इन पत्थरों में भी
अपनापन लगता है।
