Poem | बारिश के गाँव में
दीपाली पाटील
जब समंदर किनारों की हवाएँ
चुराने लगे लहरों से नमी
तब ग्रीष्म का कैलेंडर बदल
हम बारिश के गाँव जाएँगे
प्रतीक्षा की धुल बह जाएगी
समय के पत्तों से जब
मिलन की सौंधी खुशबू आएगी
तब गीली मिट्टी पर दूर तलक
हम कदमों के निशान बनाएँगे
शिकवे-शिकायतों की झड़ी
देर तक बरस कर थम जाएगी
खुशियों के फूलों से जब
पूरी वादी महक जाएगी
तब फिर तुम ठहर मत जाना
और थोड़ी दूर तक चलना साथ
तुम्हे दिखाना है
बारिश के बाद धुले हुए पत्तों पर
बूँदों के मोती कैसे चमक उठते है
जैसे कोई सपना लिए चमक उठती है
आँखें तुम्हारी
एक दरिया भी दिखाना है
जो चट्टानों से डर नहीं जाता
तुम्हारे विश्वास की तरह
सिर्फ बहता जाता है
हम वक्त के इस दरिया को पार कर
अपनी मंजिल तक जाएँगे
और पाएँगे
कि बहुत खूबसूरत था
बारिश का ये गाँव
क्योंकि भीगे-से उसके
हर मोड़ पर
था सिर्फ तुम्हारा साथ।
चुराने लगे लहरों से नमी
तब ग्रीष्म का कैलेंडर बदल
हम बारिश के गाँव जाएँगे
प्रतीक्षा की धुल बह जाएगी
समय के पत्तों से जब
मिलन की सौंधी खुशबू आएगी
तब गीली मिट्टी पर दूर तलक
हम कदमों के निशान बनाएँगे
शिकवे-शिकायतों की झड़ी
देर तक बरस कर थम जाएगी
खुशियों के फूलों से जब
पूरी वादी महक जाएगी
तब फिर तुम ठहर मत जाना
और थोड़ी दूर तक चलना साथ
तुम्हे दिखाना है
ND
बूँदों के मोती कैसे चमक उठते है
जैसे कोई सपना लिए चमक उठती है
आँखें तुम्हारी
एक दरिया भी दिखाना है
जो चट्टानों से डर नहीं जाता
तुम्हारे विश्वास की तरह
सिर्फ बहता जाता है
हम वक्त के इस दरिया को पार कर
अपनी मंजिल तक जाएँगे
और पाएँगे
कि बहुत खूबसूरत था
बारिश का ये गाँव
क्योंकि भीगे-से उसके
हर मोड़ पर
था सिर्फ तुम्हारा साथ।

